MP News : मध्यप्रदेश। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में पुलिस के गलत व्यवहार के आरोपों को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने सीनियर पुलिस अधिकारियों को इस मामले में शामिल किया है। कोर्ट ने पाया कि उसके सामने एक झूठा एफिडेविट फाइल किया गया था और उन्हीं अधिकारियों के खिलाफ सबूत बनाने के दावे किए गए थे। कोर्ट ने इन आरोपों पर सीनियर पुलिस अधिकारियों से जवाब मांगा है।
SC के आदेश के मुताबिक, अब नागरिकों को अपने बुनियादी अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए अक्सर सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ता है। स्थिति को “खतरनाक” बताते हुए कोर्ट ने कहा कि सबूत बनाने और गलत तरीके से फंसाने के आरोप सीधे तौर पर पुलिसिंग में जनता के भरोसे को प्रभावित करते हैं।
फोर्टिफाइड चावल स्टोर करने का आरोप (MP News)
यह कार्रवाई एक ऐसे मामले से शुरू हुई है जिसमें मध्य प्रदेश पुलिस ने एक गलत एफिडेविट जमा करने की बात मानी थी, जिसमें एक याचिकाकर्ता पर पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन के लिए फोर्टिफाइड चावल स्टोर करने का आरोप था, जिसके आठ क्रिमिनल रिकॉर्ड थे।
जब यह मामला 4 नवंबर को जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच के सामने आया, तो यह सामने आया कि रेप से जुड़े एक मामले समेत चार बताए गए मामलों में याचिकाकर्ता आरोपी भी नहीं था।
सैकड़ों FIR में “स्टॉक गवाहों” का इस्तेमाल (MP News)
राज्य ने इसे “कंप्यूटर से हुई” गड़बड़ी बताया क्योंकि पिटीशनर और उसके पिता का नाम एक ही था। सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 24 साल के वकील असद अली वारसी ने एक इंटरवेंशन फाइल किया था जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्हीं पुलिस अधिकारियों ने रिश्वत देने से मना करने पर उसे ड्रंक-ड्राइविंग केस में झूठा फंसाने के लिए सबूत बनाए थे। एप्लीकेशन में दावा किया गया कि सैकड़ों FIR में “स्टॉक गवाहों” का इस्तेमाल किया गया, वारसी पर हमला हुआ और घटना उसके फोन में रिकॉर्ड हो गई, और एक SHO और एक दूसरे अधिकारी को गवाह के तौर पर दिखाया गया, जबकि वे मौजूद नहीं थे।