उज्जैन जिले के दंगवाड़ा गांव में स्थित बोरेश्वर महादेव मंदिर अन्य शिव मंदिरों से बिल्कुल अलग है। जहां अधिकांश मंदिरों में भगवान शिव शिवलिंग के रूप में पूजे जाते हैं वहीं यहां शिवलिंग बोर के आकार की आकृति में स्थापित है। यह शिवलिंग बेलनाकार लंबा और गोल दिखाई देता है और जमीन के ऊपर नहीं बल्कि नीचे की ओर धंसा हुआ है।
यह मंदिर अत्यंत प्राचीन माना जाता है और इसकी ऐतिहासिक जड़ें ताम्र पाषाण काल से लेकर गुप्त काल तक फैली हुई बताई जाती हैं। मंदिर के गर्भगृह में विराजमान भगवान बोरेश्वर महादेव स्वयंभू हैं। मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता इसकी जलाधारी है जिसमें कितना भी जल अर्पित किया जाए उसका स्तर कभी न बढ़ता है और न ही घटता है। यह रहस्य आज तक वैज्ञानिकों के लिए भी एक पहेली बना हुआ है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर में 12 ज्योतिर्लिंगों का समावेश है। यही कारण है कि दूर-दूर से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। कहा जाता है कि मंदिर में रात के समय चमत्कार होते हैं। भक्तों का विश्वास है कि रात्रि में नंदी महाराज स्वयं भगवान के दर्शन के लिए मंदिर आते हैं और उस दौरान मंदिर की घंटियां अपने आप बजने लगती हैं।मंदिर के समीप से चंबल नदी भी गुजरती है जो शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं बल्कि आधी परिक्रमा करती है। इसे भगवान शिव के सोमसूत्र के नियम का पालन माना जाता है जो इस स्थान को और भी रहस्यमयी बनाता है।
महाशिवरात्रि के अवसर पर बोरेश्वर महादेव मंदिर में विशेष शृंगार किया जाता है और बाबा की भव्य सवारी नगर भ्रमण के लिए निकलती है जो वापस मंदिर में आकर संपन्न होती है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान शिव स्वयं नगर में भ्रमण कर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। सावन मास में भी प्रत्येक सोमवार को बाबा की सवारी निकलती है जिसमें शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं।