जयपुर। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट का यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाना उचित निर्णय है। मायावती ने यह भी सुझाव दिया कि अगर नए नियम लागू किए जाते समय सवर्ण समाज को भी उचित प्रतिनिधित्व दिया जाता और सभी पक्षों की सहमति ली जाती, तो विवाद से बचा जा सकता था। UGC ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए नए नियम लागू किए थे। इन नियमों में विशेष रूप से एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों को लक्षित किया गया, जबकि सामान्य वर्ग के लिए कोई स्पष्ट सुरक्षा प्रावधान नहीं था।
इस पर कुछ याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। चीफ जस्टिस ने सुनवाई के दौरान कहा कि आजादी के 75 सालों में भारत ने जातिविहीन समाज की दिशा में प्रगति की है, क्या हम अब पीछे जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी किया और 13 जनवरी को लागू हुए नए UGC रेगुलेशंस पर रोक लगा दी। मायावती ने कहा कि नए नियमों के कारण सामाजिक तनाव पैदा हुआ और अगर सभी पक्षों की राय ली जाती और अपरकास्ट/सवर्णों को न्यायसंगत प्रतिनिधित्व दिया जाता, तो विवाद से बचा जा सकता था। बीएसपी सुप्रीमो ने जोर देकर कहा कि उच्च शिक्षा में समानता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे लागू करते समय सभी वर्गों के अधिकार और न्याय का ध्यान रखना जरूरी है।
उन्होंने प्रशासन और विश्वविद्यालयों से अपील की कि सभी नियम पारदर्शी और निष्पक्ष हों ताकि समाज में सामाजिक असंतोष न बढ़े। विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह कदम उच्च शिक्षा संस्थानों में संतुलन और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिहाज से अहम है। वहीं, राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से यह मामला ध्यानाकर्षक है क्योंकि इसमें देश के सामाजिक संवेदनशील वर्गों के अधिकारों और प्रतिनिधित्व की बहस छिड़ी हुई है। इस फैसले के बाद अब सरकार और UGC को नए नियमों को दोबारा ड्राफ्ट करना होगा, जिसमें सभी वर्गों की भागीदारी और सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जाएगा। मायावती ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल जाति या धर्म का नहीं है, बल्कि समानता, न्याय और सामाजिक शांति से जुड़ा है।