जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (MP High Court) ने मानव-वन्यजीव संघर्ष के बढ़ते मामलों पर सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई है। चीफ जस्टिस संजीव सच्चदेवा और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के 17 नवंबर 2025 के आदेश (टीएन गोदावर्मन केस) के अनुपालन की स्टेटस रिपोर्ट चार सप्ताह में पेश करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट आने के बाद जनहित याचिकाकर्ता के सुझावों पर विचार किया जाएगा।
मुख्य बिंदु जो कोर्ट में उठे (MP High Court)
– हाथियों को रेस्क्यू के नाम पर लंबे समय तक कैद रखना अमानवीय है।
– फसल-मवेशी के नुकसान का मुआवजा सिर्फ 17% तक मिल पाता है, प्रक्रिया बेहद धीमी।
– पटवारी के बजाय वन विभाग को ही नुकसान का आकलन और मुआवजा देने की जिम्मेदारी मिले।
– वन्यजीवों की मौत पर 10 लाख रुपये मुआवजा तुरंत तय हो।
– किसान करंट तार लगाने को मजबूर हैं, इससे बाघों समेत कई वन्य प्राणियों की मौत हो रही है।
याचिकाकर्ता रायपुर निवासी नितिन संघवी के वकील अंशुमान सिंह ने कोर्ट को बताया कि प्रदेश में बाघों की मौत का एक बड़ा कारण करंट ही है। किसान अपनी फसल बचाने के लिए हाई-वोल्टेज तार लगा रहे हैं, क्योंकि मुआवजा समय पर नहीं मिलता।
कोर्ट ने पिछली सुनवाई में पूछा था कि कान्हा में कैद हाथियों को कब छोड़ा जाएगा। सरकार ने बताया कि दो हाथियों को रेडियो कॉलर लगाकर जंगल में छोड़ दिया गया है, बाकी जल्द छोड़े जाएंगे।
जल्दी नीति बनाओ और लागू करो (MP High Court)
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को 6 महीने में विस्तृत नीति बनाने का आदेश दिया था, जिसमें उत्तर प्रदेश-केरल मॉडल अपनाने को कहा गया है। अब हाईकोर्ट ने मध्यप्रदेश सरकार को याद दिलाया है कि समय सीमा निकल रही है, जल्दी नीति बनाओ और लागू करो।
अगली सुनवाई में सरकार को पूरी प्रोग्रेस रिपोर्ट पेश करनी होगी। कोर्ट ने साफ कहा है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को प्राकृतिक आपदा की तरह माना जाए और पीड़ितों को तुरंत राहत मिले। किसान और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने के संकेत कोर्ट ने दिए हैं।