पूरा विवाद: वर्चस्व का दुरुपयोग और 213 करोड़ का जुर्माना यह मामला कॉम्पिटिशन कमीशन ऑफ इंडिया द्वारा मेटा पर लगाए गए 213 करोड़ रुपये के जुर्माने से जुड़ा है। CCI ने पाया था कि मेटा ने OTT मैसेजिंग मार्केट में अपने वर्चस्व का दुरुपयोग किया और व्हाट्सएप के जरिए डेटा शेयरिंग की शर्तों को जबरन लागू किया। जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, तो कोर्ट ने कमर्शियल मुनाफे से ऊपर नागरिकों के अधिकारों को रखा।
आम आदमी की समझ से परे ‘प्राइवेसी पॉलिसी’ सुनवाई के दौरान सूर्यकांत ने व्हाट्सएप की प्राइवेसी पॉलिसी की भाषा पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा भ्रामक भाषा: पॉलिसी इतनी जटिल है कि एक आम आदमी या कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति यह समझ ही नहीं सकता कि उसका डेटा कहाँ और कैसे इस्तेमाल होगा।
उदाहरण: सीजेआई ने कहा कि क्या सड़क किनारे सामान बेचने वाला व्यक्ति या केवल क्षेत्रीय भाषा जानने वाली बुजुर्ग महिला आपकी शर्तों के पेचीदा मायाजाल को समझ सकती है? सूचित सहमति कोर्ट ने जोर दिया कि जब तक यूजर पूरी तरह न समझ ले कि वह किस बात के लिए सहमति दे रहा है, तब तक उसे ‘सहमति’ नहीं माना जा सकता।
‘संविधान का पालन या भारत छोड़ो’ जैसा सख्त संदेश सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को एक कड़ा संदेश दिया है कि भारतीय नागरिकों की निजता का अधिकार अब एक मूल अधिकार है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यावसायिक इकाई को देश के संविधान के दायरे से बाहर जाकर काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यदि कंपनियां डेटा सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन नहीं करती हैं, तो उन्हें कानूनी राहत की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए।