जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने यह आदेश मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार समेत अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी मुठभेड़ अब नियमित होती जा रही हैं और कथित तौर पर इसका उद्देश्य वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करना या आरोपियों को सबक सिखाना हो सकता है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस आरोपी के पैरों में गोली मारकर इसे मुठभेड़ बताती है और यह पूरी तरह अस्वीकार्य है। न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुसार किसी भी व्यक्ति को सजा देने का अधिकार केवल अदालत के पास है पुलिस के पास नहीं है। कोर्ट ने चिंता जताई कि छोटे मोटे अपराधों जैसे चोरी के मामलों में भी पुलिस एनकाउंटर का सहारा ले रही है।
कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि ऐसे निर्देश जारी किए गए और उनका पालन किया गया तो संबंधित जिले के पुलिस प्रमुख यानी SP SSP या कमिश्नर व्यक्तिगत रूप से कोर्ट की अवमानना के लिए जिम्मेदार होंगे। इस स्थिति में उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे निर्देश और प्रथाएं कानून व्यवस्था के नाम पर अनुचित और असंवैधानिक हैं।अदालत ने यह भी कहा कि हाफ एनकाउंटर प्रथा से न केवल आरोपी का जीवन खतरे में पड़ता है बल्कि यह पुलिस के प्रति आम जनता के विश्वास को भी प्रभावित करती है। न्यायालय ने डीजीपी और गृह सचिव से पूछा कि इस तरह के निर्देश किसी प्रकार से नीति या प्रशिक्षण का हिस्सा तो नहीं बन गए।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद यूपी पुलिस में हलचल मची है और सभी वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में लिखित रूप से स्पष्ट जवाब देने की तैयारी में हैं। पुलिस विभाग का कहना है कि कानून का पालन किया जाएगा और भविष्य में किसी भी प्रकार की असंवैधानिक कार्रवाई नहीं होने दी जाएगी।इस आदेश को पुलिस प्रशासन और न्यायपालिका के बीच जवाबदेही और संवैधानिक अधिकारों की सीमा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।