इस फिल्म को बनाने से पहले रणदीप हुड्डा को कई लोगों ने यह चेतावनी दी थी कि वे इस तरह की संवेदनशील और ऐतिहासिक फिल्म का हिस्सा न बनें क्योंकि इसका उनके करियर पर नकारात्मक असर पड़ सकता है कई शुभचिंतकों ने उन्हें यह फिल्म छोड़ने की सलाह दी लेकिन रणदीप ने इन सभी चेतावनियों को दरकिनार करते हुए इसे बनाने का निर्णय लिया और खुद ही इस प्रोजेक्ट की कमान संभाल ली
फिल्म की कहानी को पर्दे पर जीवंत बनाने के लिए रणदीप हुड्डा ने असाधारण मेहनत की उन्होंने वीर सावरकर के किरदार में ढलने के लिए 32 किलो तक वजन कम किया और खुद को मानसिक रूप से भी उस दौर की परिस्थितियों में ढालने का प्रयास किया काला पानी की सजा के दौरान सावरकर की स्थिति को समझने के लिए उन्होंने खुद को अंधेरे कमरे में बंद रखना शुरू कर दिया और दिन में केवल एक बार भोजन किया ताकि किरदार की गहराई को महसूस किया जा सके
फिल्म के लिए रिसर्च के दौरान रणदीप ने पाया कि सावरकर के बारे में अंग्रेजी साहित्य में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है इस कारण उन्होंने विभिन्न किताबों और स्रोतों का अध्ययन किया और एक आधारभूत स्क्रिप्ट तैयार की हालांकि पूरी स्क्रिप्ट और संवाद तैयार करने के लिए उन्होंने अपने सह लेखक के साथ मिलकर मात्र तीन दिनों में पूरी पटकथा लिख डाली इस दौरान उन्होंने लगातार 12-12 घंटे काम किया
इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए रणदीप हुड्डा ने न केवल अपनी मेहनत बल्कि अपनी निजी संपत्ति का भी एक हिस्सा लगाया यह उनके समर्पण और जुनून को दर्शाता है कई लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है कि फिल्म के निर्माण के दौरान उन्हें बॉलीवुड इंडस्ट्री से अपेक्षित समर्थन भी नहीं मिला
फिल्म को लेकर कुछ रचनात्मक मतभेद भी सामने आए जिसके चलते निर्देशक महेश मांजरेकर ने इस प्रोजेक्ट को बीच में ही छोड़ दिया इसके बाद रणदीप ने खुद ही फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी संभाली और इसे पूरा किया
फिल्म रिलीज के बाद यह विवादों में भी रही और इसका बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन भी अपेक्षा के अनुसार नहीं रहा लेकिन इसके बावजूद यह फिल्म रणदीप हुड्डा के साहस और समर्पण का प्रतीक बन गई जो यह दिखाती है कि एक कलाकार अपने जुनून के लिए किस हद तक जा सकता है