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अमेरिकियों के लिए भी अच्छा है मजबूत भारत, शांति बनाने में भूमिका अहम; US अधिकारी बोले

वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान युद्ध के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मंगलवार को कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता के साथ-साथ एशिया में अनुकूल शक्ति संतुलन सुनिश्चित करने के लिए भारत की भूमिका बेहद जरूरी है। उन्होंने भू-राजनीति में हो रहे व्यापक बदलाव के मद्देनजर दोनों पक्षों के बीच गहरे रक्षा संबंधों के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

अमेरिकी युद्ध नीति के उप सचिव एलब्रिज कोल्बी ने अनंत केंद्र में अपने संबोधन में भारत-अमेरिका रणनीतिक जुड़ाव के महत्व को रेखांकित करते हुए चार प्रमुख बिंदु पेश किए और इस बात पर जोर दिया कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में किसी एक शक्ति का प्रभुत्व नहीं होना चाहिए।

उनके इस बयान को परोक्ष रूप से चीन की तरफ संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
भारत की भूमिका को जरूरी बताया

उन्होंने कहा, ‘अमेरिका का मानना ​​है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अनुकूल शक्ति संतुलन सुनिश्चित करने में भारत केंद्रीय भूमिका निभाएगा। इस संदर्भ में, एक मजबूत और आत्मविश्वासी भारत न केवल भारतीय जनता के लिए अच्छा है, बल्कि अमेरिकियों के लिए भी अच्छा है।’ पश्चिम एशिया में बढ़ते संकट और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच कोल्बी की दो दिवसीय नई दिल्ली यात्रा का विशेष महत्व है।
‘भारत और अमेरिका को हर बात पर सहमत होना जरूरी नहीं’

उन्होंने कहा, ‘सबसे पहली बात तो यह कि प्रभावी सहयोग के लिए अमेरिका और भारत को हर बात पर सहमत होना जरूरी नहीं है। जरूरी यह है कि हमारे हित और उद्देश्य मूलभूत मुद्दों पर तेजी से एक समान होते जा रहे हैं।’ कोल्बी ने कहा, ‘रणनीतिक मामलों पर सामंजस्य और सहयोग को गहरा करने के लिए मतभेद और यहां तक ​​कि विवाद भी पूरी तरह से अनुकूल हैं। हमारी साझेदारी की जड़ें दिखावे से कहीं अधिक गहरी और सतही सौहार्द से कहीं अधिक टिकाऊ हैं; ये स्थायी रणनीतिक और आपसी हित में गहराई से शामिल हैं।’
किससे होगा फायदा

उन्होंने कहा, ‘हमारे दोनों देशों को एक ऐसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र से लाभ होता है जिसमें कोई भी शक्ति इस क्षेत्र पर हावी नहीं हो सकती।

दोनों को खुले व्यापार और राष्ट्रीय स्वायत्तता से लाभ होता है।’ कोल्बी ने तर्क दिया कि ये ठोस और साझा हित हमारी स्थायी रणनीतिक साझेदारी की नींव हैं।

अपने दूसरे बिंदु को स्पष्ट करते हुए कोल्बी ने कहा कि भारत और अमेरिका दोनों ही इस क्षेत्र में टिकाऊ संतुलन के लिए सैन्य शक्ति की रणनीतिक केंद्रीयता को पहचानते हैं, और इसलिए रक्षा सहयोग को केवल प्रतीकात्मक या निष्क्रियता से प्रेरित होने के बजाय वास्तविक क्षमता को बढ़ाने पर केंद्रित होना चाहिए।
रक्षा संबंधों पर की बात

कोल्बी ने अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के हवाले से कहा कि दोनों पक्षों के बीच रक्षा संबंध पहले से कहीं अधिक मजबूत हैं। उन्होंने कहा कि रक्षा औद्योगिक और प्रौद्योगिकी सहयोग को ‘नई गति’ मिल रही है। इस संदर्भ में उन्होंने पिछले साल अक्टूबर में अंतिम रूप दिए गए ‘प्रमुख रक्षा साझेदारी’ ढांचे का भी उल्लेख किया।

कोल्बी ने कहा कि अमेरिका भारत के साथ मिलकर लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता, सुदृढ़ रसद आपूर्ति, पनडुब्बी रोधी युद्ध और उन्नत प्रौद्योगिकियों सहित कई क्षेत्रों में सहयोग को तेज करने और बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
तीसरा पॉइंट

अपने तीसरे बिंदु में, अमेरिकी उप सचिव ने सैन्य हार्डवेयर के संभावित सह-उत्पादन और सह-विकास के महत्व पर जोर दिया। कोल्बी ने कहा कि अमेरिका भारत को सैन्य बिक्री बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन साथ ही वह नई दिल्ली की ओर से स्वदेशी रक्षा उद्योग को विकसित करने की महत्वाकांक्षा को भी मान्यता देता है।

उन्होंने कहा, ‘एक मजबूत घरेलू औद्योगिक आधार संप्रभुता और लचीलेपन को बढ़ाता है। अमेरिका इस उद्देश्य का समर्थन करता है। भारत इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।’ ट्रंप प्रशासन के अधिकारी ने कहा, ‘भारत के पास पहले से ही एक प्रभावशाली रक्षा औद्योगिक आधार है और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों में भारत का नेतृत्व हमारे रक्षा सहयोग को और भी व्यापक बनाने में सहायक है।’

कोल्बी ने अपने चौथे बिंदु में कहा कि अमेरिका और भारत हर मुद्दे पर सहमत नहीं होंगे, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी तर्क दिया कि किसी भी असहमति से सहयोग में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए।

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