खेल को ‘जीवन का हिस्सा’ बनाने की सोच
‘स्पोर्ट्स: ए वे ऑफ लाइफ’ थीम के तहत आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कलराज मिश्र ने की। इस मौसिकी पर प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी अशोक ध्यानचंद, संस्थान के उपाध्यक्ष डॉ. मिलिंद पैजेंड और कई वैज्ञानिक मौजूद रहे। कार्यक्रम में कोरियोग्राफी ने खेल को केवल प्रतिस्पर्धा नहीं कहा, बल्कि जीवन के आधार पर शासन-प्रशासन, नेतृत्व और टीमवर्क-से जुड़ने की जरूरत पर जोर दिया।
कॅन्स्क पैवेलियन का विजन: अल्फाबेट से स्पोर्ट्स तक
इस प्रोजेक्ट की परिकल्पना खेल के इंजीनियर और कॉन्सेप्ट क्लिनिक के अध्यक्ष कनिष्क पांडे ने की है। उन्होंने बताया कि जैसे अक्षरा के बच्चों की शिक्षा की स्थापना होती है, वैसे ही ‘स्पोर्ट्स अल्फाबेट’ खेलों की प्रति रुचि जगाने का पहला कदम बन सकता है। यह पुस्तिका बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने के साथ-साथ खेलों की समझ भी विकसित करती है—यानी शिक्षा और खेल का एक साथ विकास।
मोबाइल से लेकर ग्राउंड तक:बच्चों को सक्रिय बनाने की पहल
सबसे पहले इसका एक बड़ा उद्देश्य बच्चों को स्क्रीन से दूर मैदान की ओर प्रेरित करना है। पैंडेज़ के अनुसार, आज के डिजिटल दौर में बच्चे मोबाइल, कंप्यूटर और ऑफ़लाइन गेमिंग पर अधिक प्रतिबंधात्मक हो रहे हैं। ‘स्पोर्ट्स अल्फ़ाबेट’ उन्हें ड्रूड डायजेक्स और शारीरिक-मानसिक विकास में मदद करना चाहिए। साथ ही किंडरगार्टन स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता, निर्देश और नेतृत्व जैसे गुण भी विकसित होंगे।
भारत की भाषा विविधता का सम्मान
इस प्रोजेक्ट की विशेषता इसका बहुभाषी स्वरूप है। बुकलेट हिंदी, अंग्रेजी, अरबी, संस्कृत, मराठी, टोकरा, भोजपुरी, राजस्थानी, कश्मीरी, पंजाबी, तमिल, वर्गीय, कन्नड़, मलयालम, उड़िया और गुजराती सहित कई भारतीय भाषाओं में तैयार की गई है। इसमें अरबी और नेपाली के अलावा विदेशी समुद्र भी शामिल है। यह सबसे पहले भारत की ‘एकता में विविधता’ की भावना को मजबूत करता है।
विश्वव्यापी से प्रेरणा
पैंडेज़ ने ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय जैसे एबेट का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां शिक्षा और खेल एक-दूसरे के पूरक हैं। उनके छात्र अध्ययन के साथ-साथ ओलंपिक स्तर पर भी अपने देश के प्रतिनिधि होते हैं। भारत में भी इसी मॉडल को विपरीत की आवश्यकता है।
नेपाल तक एपीआई पहल, इंटरनेट मार्केटिंग
नेपाल के सांसद अभिषेक प्रताप शाह ने भी इसे अपने देश में लागू करने की इच्छा जताई है। इससे साफ है कि यह प्रोजेक्ट सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभाव डाल सकता है।
प्रेरणादायक कदम: खेल और शिक्षा का संगम
कार्यक्रम के अंत में कलराज मिश्रा ने प्रशिक्षकों को बधाई देते हुए कहा कि यह सबसे पहले भारत की सांस्कृतिक विविधता और एकता को दर्शाता है। वहीं अशोक ध्यानचंद ने भी इस प्रोजेक्ट को लंबे समय तक लागू करने वाला कदम बताया।