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आस्था या खतरा नर्मदा में 11 हजार लीटर दूध से बढ़ा प्रदूषण जलीय जीवन पर संकट


भोपाल । मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध प्रवाहित करने की घटना अब गंभीर पर्यावरणीय चिंता का विषय बन गई है। धार्मिक आस्था के तहत किए गए इस आयोजन के बाद विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इसका असर केवल तत्काल नहीं बल्कि लंबे समय तक देखने को मिलेगा। विशेष रूप से इसका दूसरा चरण जिसे सेकेंड फेज कहा जा रहा है वह और भी खतरनाक साबित हो सकता है।

पर्यावरण विशेषज्ञ सुभाष सी पांडे के अनुसार इतनी बड़ी मात्रा में दूध नदी में जाने से पानी का संतुलन तेजी से बिगड़ जाता है। शुरुआत में सबसे बड़ा असर घुलित ऑक्सीजन के स्तर पर पड़ता है। सामान्य परिस्थितियों में पानी में ऑक्सीजन का स्तर 6 से 8 mg प्रति लीटर होता है लेकिन दूध के मिश्रण के बाद यह घटकर 1 से 3 mg प्रति लीटर तक पहुंच सकता है। इससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए जीवन संकट खड़ा हो जाता है और उनकी मौत शुरू हो सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी मात्रा में दूध को वैज्ञानिक दृष्टि से डेयरी वेस्ट माना जाता है जो सामान्य सीवेज से भी अधिक खतरनाक होता है। दूध में मौजूद कार्बनिक तत्व पानी में घुलकर तेजी से बैक्टीरिया की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं जिससे प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी का स्तर सामान्य 3 mg प्रति लीटर से बढ़कर 1000 से 1300 mg प्रति लीटर तक पहुंच सकता है जो बेहद खतरनाक स्थिति है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर पहलू सेकेंड फेज में सामने आता है। पहले चरण में जहां ऑक्सीजन की कमी से जलीय जीव मरते हैं वहीं दूसरे चरण में उनके सड़ने से पानी में बैक्टीरिया और फंगस की मात्रा तेजी से बढ़ती है। यह एक चेन रिएक्शन की तरह काम करता है जिसमें पानी की गुणवत्ता लगातार गिरती जाती है और प्रदूषण लंबे समय तक बना रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर महीनों तक देखा जा सकता है।

इसका प्रभाव केवल एक स्थान तक सीमित नहीं रहता बल्कि जहां दूध प्रवाहित किया गया वहां से कई किलोमीटर डाउनस्ट्रीम तक पानी पीने योग्य नहीं रहता। इससे आसपास के गांवों और लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। नर्मदा का पानी सामान्यतः क्षारीय प्रकृति का होता है लेकिन दूध के अम्लीय गुण इसके संतुलन को बिगाड़ सकते हैं जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।

विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि नदियों के प्रदूषण का मुख्य कारण मानव गतिविधियां ही हैं चाहे वे धार्मिक हों या सामाजिक। पूजा सामग्री फल फूल और अन्य वस्तुओं का विसर्जन भी नदी की सेहत को लगातार नुकसान पहुंचा रहा है। कानूनी रूप से भी इस तरह की गतिविधियों पर रोक है। जल निवारण एवं प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम 1974, राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम 2010 और जैविक विविधता अधिनियम 2002 के तहत जल संसाधनों को व्यवस्थित करना दंडनीय है लेकिन जमीनी स्तर पर सख्ती की कमी के कारण ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल कानून से नहीं बल्कि जागरूकता और जिम्मेदारी से संभव है। आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है ताकि धार्मिक परंपराएं भी निभें और प्रकृति को नुकसान भी न पहुंचे। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में नर्मदा जैसी महत्वपूर्ण नदी की स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।

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