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खनन क्षेत्र को राहत: लो-ग्रेड आयरन ओर के इस्तेमाल पर नए नियम लागू


नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने कम गुणवत्ता (लो-ग्रेड) वाले लौह अयस्क के बेहतर उपयोग और बर्बादी रोकने के लिए अहम कदम उठाया है। खान मंत्रालय ने इसके लिए प्राइसिंग नियमों में बदलाव करते हुए नया ढांचा तैयार किया है, जिससे ऐसे अयस्क का आर्थिक रूप से उपयोग संभव हो सके।

नई प्राइसिंग व्यवस्था से स्पष्टता
नए नियमों के तहत 45% से कम आयरन (Fe) कंटेंट वाले अयस्क जैसे बैंडेड हेमेटाइट क्वार्टजाइट (BHQ) और बैंडेड हेमेटाइट जैस्पर (BHJ) के लिए अलग से मूल्य निर्धारण की व्यवस्था की गई है। 35% से 45% Fe कंटेंट वाले अयस्क की औसत बिक्री कीमत (ASP) अब 45-51% ग्रेड के अयस्क की ASP का 75% होगी। 35% से कम Fe कंटेंट वाले अयस्क की ASP 50% तय की गई है।

पहले क्या थी समस्या?
पहले लो-ग्रेड अयस्क के लिए अलग प्राइसिंग सिस्टम नहीं था। रॉयल्टी और अन्य शुल्क उच्च ग्रेड (45-51%) अयस्क के आधार पर तय होते थे, जिससे लो-ग्रेड अयस्क को प्रोसेस करना आर्थिक रूप से नुकसानदायक हो जाता था। यही वजह थी कि बड़ी मात्रा में यह संसाधन बेकार चला जाता था।

नई तकनीक से बढ़ेगा उपयोग
सरकार का कहना है कि आधुनिक तकनीकों की मदद से BHQ और BHJ जैसे लो-ग्रेड अयस्क को प्रोसेस कर उच्च गुणवत्ता वाले स्टील निर्माण योग्य मटेरियल में बदला जा सकता है। नई प्राइसिंग नीति इस प्रक्रिया को प्रोत्साहित करेगी।

रॉयल्टी नियमों में भी बदलाव
नए नियमों के तहत यदि कच्चे अयस्क (ROM) को प्रोसेस करने से उसकी कीमत घटती है, तो रॉयल्टी का निर्धारण प्रोसेसिंग से पहले की स्थिति (प्रारंभिक स्क्रीनिंग) के आधार पर किया जाएगा। इससे कीमत को कृत्रिम रूप से कम दिखाने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।

स्टील इंडस्ट्री और संसाधन संरक्षण को फायदा
सरकार के मुताबिक इस कदम से:

हाई-ग्रेड अयस्क पर निर्भरता कम होगी

स्टील उद्योग को कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति मिलेगी

खनिज संसाधनों का संरक्षण होगा

बेकार माने जाने वाले अयस्क का भी उपयोग बढ़ेगा

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