बहुत कम लोग इस तथ्य से परिचित हैं कि फिल्मी चकाचौंध में आने से पहले रामी रेड्डी पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय थे। आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में जन्मे रेड्डी ने हैदराबाद के विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री हासिल की और एक दैनिक समाचार पत्र में अपनी सेवाएं दीं। हालांकि उनके भीतर के कलाकार ने उन्हें अंततः अभिनय की ओर खींच लिया। क्षेत्रीय सिनेमा से शुरू हुआ उनका सफर हिंदी सिनेमा तक पहुंचा जहां कर्नल शिकारा और स्पॉट नाना जैसे किरदारों ने उन्हें रातों रात घर-घर में मशहूर कर दिया। उनके संवाद बोलने का सपाट अंदाज और दक्षिण भारतीय पुट वाली आवाज दर्शकों के जेहन में आज भी ताजा है।
सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद इस महान कलाकार का जीवन संघर्षों के एक कठिन दौर में प्रवेश कर गया। साल दो हजार दस के आसपास उनकी सेहत में भारी गिरावट दर्ज की गई और गंभीर बीमारी की पुष्टि हुई। इस शारीरिक समस्या ने उनके स्वास्थ्य पर इतना बुरा प्रभाव डाला कि पर्दे पर बेहद मजबूत दिखने वाला यह कलाकार शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो गया। अपने अंतिम दिनों में उनकी स्थिति इतनी बदल गई थी कि उन्हें पहचानना तक मुश्किल था लेकिन उनकी इच्छाशक्ति अंत तक बनी रही।
बीमारी से लंबी और साहसी लड़ाई लड़ने के बाद चौदह अप्रैल दो हजार ग्यारह को महज बावन वर्ष की आयु में इस महान अभिनेता ने हैदराबाद में अंतिम सांस ली। उनका असमय जाना फिल्म जगत के लिए एक ऐसी अपूरणीय क्षति थी जिसकी भरपाई आज भी नहीं हो सकी है। रामी रेड्डी अपने पीछे एक समृद्ध फिल्मी विरासत छोड़ गए हैं जो आने वाली पीढ़ी के कलाकारों के लिए एक प्रेरणा की तरह है। आज भले ही वह हमारे बीच मौजूद नहीं हैं लेकिन उनकी फिल्मों के दृश्य और उनकी वह डरावनी खामोशी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में हमेशा जीवित रहेगी।