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तीस्ता प्रोजेक्ट में चीन की एंट्री से बढ़ी हलचल, बांग्लादेश-चीन की नजदीकी पर भारत की पैनी नजर



नई दिल्ली। बांग्लादेश की नई सरकार ने तीस्ता नदी प्रबंधन और पुनर्स्थापन परियोजना के लिए चीन से औपचारिक सहयोग मांगा है, जिससे दक्षिण एशिया की रणनीतिक राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है। यह कदम भारत-बांग्लादेश संबंधों और क्षेत्रीय संतुलन पर असर डाल सकता है।

बीजिंग में हुई अहम बैठक
बुधवार को बीजिंग में बांग्लादेश के विदेश मंत्री खालिलुर रहमान और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई बैठक में तीस्ता रिवर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट एंड रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट (TRCMRP) पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों देशों ने आर्थिक सहयोग, इंफ्रास्ट्रक्चर और रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने पर सहमति जताई।

चीन ने जताई निवेश में रुचि
चीन ने कहा कि वह बांग्लादेश की विकास योजनाओं को बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के साथ जोड़ने को तैयार है। साथ ही चीनी कंपनियों को बांग्लादेश में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने की बात भी कही गई।चीनी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि उसका सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है और न ही इसे किसी अन्य देश से प्रभावित होना चाहिए।

तीस्ता नदी क्यों है अहम?
तीस्ता नदी सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है और वहां लाखों लोगों की सिंचाई और जीवन का मुख्य आधार है। इसी कारण यह परियोजना भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जाती है, खासकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए।

भारत की रणनीतिक चिंता
भारत ने हाल के वर्षों में बांग्लादेश के साथ जल प्रबंधन सहयोग बढ़ाने की कोशिश की है और 2024 में तीस्ता बेसिन के लिए तकनीकी सहायता का प्रस्ताव भी दिया था। चीन की बढ़ती मौजूदगी से क्षेत्रीय संतुलन पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

ढाका की कूटनीतिक संतुलन नीति
नई बांग्लादेश सरकार चीन के साथ संबंध मजबूत कर रही है, जबकि साथ ही भारत के साथ भी संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रही है। इससे ढाका एक बहु-ध्रुवीय कूटनीतिक रणनीति अपनाता दिख रहा है।

चीन-बांग्लादेश आर्थिक साझेदारी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन अब बांग्लादेश का चौथा सबसे बड़ा कर्जदाता बन चुका है और 1975 से अब तक करीब 7.5 अरब डॉलर का निवेश और ऋण दे चुका है।

तीस्ता प्रोजेक्ट में चीन की एंट्री ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को और जटिल बना दिया है। जहां बांग्लादेश विकास और निवेश के नए रास्ते तलाश रहा है, वहीं भारत अपनी रणनीतिक सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर सतर्क नजर बनाए हुए है।

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