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MP हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: प्रमुख सचिव समेत 3 अधिकारियों पर 25-25 हजार का जमानती वारंट


नई दिल्ली ।  मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अवमानना मामले में सख्त रुख अपनाते हुए प्रमुख सचिव सहित तीन अधिकारियों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया है। मामला रीवा जिला उद्योग केंद्र में पदोन्नति से जुड़ा है, जहां कोर्ट के पहले आदेश के बावजूद पालन नहीं किया गया था।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम सुनवाई में आदेश की अवमानना को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार के प्रमुख सचिव सहित तीन वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ 25-25 हजार रुपये के जमानती वारंट जारी कर दिए हैं। यह कार्रवाई उस मामले में की गई है, जिसमें कोर्ट के पहले आदेश के बावजूद पदोन्नति से जुड़े निर्देशों का पालन नहीं किया गया था।

यह पूरा मामला रीवा जिला उद्योग केंद्र से जुड़ा है, जहां पदस्थ असिस्टेंट मैनेजर जयप्रकाश तिवारी की पदोन्नति पर निर्णय लंबित था। याचिकाकर्ता का कहना था कि वे मैनेजर पद पर पदोन्नति के लिए पूरी तरह पात्र हैं, लेकिन विभागीय स्तर पर लगातार टालमटोल की जा रही थी।

कोर्ट के पहले आदेश के बावजूद नहीं हुआ पालन

इस मामले में हाईकोर्ट ने 4 नवंबर 2024 को स्पष्ट आदेश जारी करते हुए संबंधित विभाग को 90 दिनों के भीतर पदोन्नति पर निर्णय लेने के निर्देश दिए थे। लेकिन तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी आदेश का पालन नहीं किया गया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका दायर की।

तीन वरिष्ठ अधिकारी बने पक्षकार

इस अवमानना याचिका में एमएसएमई विभाग के प्रमुख सचिव राघवेन्द्र सिंह, आयुक्त दिलीप कुमार सिंह और जिला उद्योग केंद्र रीवा के जनरल मैनेजर राहुल दुबे को पक्षकार बनाया गया था। अदालत में यह भी सामने आया कि तीनों अधिकारियों को नोटिस विधिवत रूप से तामील कर दिए गए थे, इसके बावजूद वे सुनवाई के दौरान उपस्थित नहीं हुए।

कोर्ट की नाराजगी और कड़ा रुख

सुनवाई के दौरान जस्टिस विशाल मिश्रा की सिंगल बेंच ने अधिकारियों की अनुपस्थिति पर नाराजगी जताई और इसे कोर्ट के आदेश की गंभीर अवमानना माना। इसके बाद अदालत ने भोपाल और रीवा के पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिए कि वे संबंधित अधिकारियों के खिलाफ जारी वारंट को तामील कराएं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायालय के आदेशों की अनदेखी को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। इसी के साथ तीनों अधिकारियों के खिलाफ 25-25 हजार रुपये के जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया गया।

अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद

मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित की गई है। इस दौरान अदालत यह भी तय करेगी कि आगे की कार्रवाई क्या होगी। यह मामला एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही और न्यायालय के आदेशों के अनुपालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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