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दोस्ती के खातिर संसद पहुंचे थे बिग बी, लेकिन सियासी साजिशों और आरोपों ने तीन साल में ही करा दी ग्लैमर की दुनिया में वापसी।


नई दिल्ली ।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमिताभ बच्चन का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, लेकिन उनके जीवन का एक अध्याय ऐसा भी है जिसे वह अक्सर एक कड़वी याद की तरह देखते हैं। साल 1984 में जब देश एक बड़े राजनीतिक बदलाव से गुजर रहा था, तब अपनी गहरी दोस्ती और भावनात्मक जुड़ाव के कारण अमिताभ बच्चन ने फिल्मी पर्दे की चकाचौंध छोड़ राजनीति की ऊबड़-खाबड़ गलियों में कदम रखा था। उन्होंने अपने जन्मस्थान इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया और एक अनुभवी राजनेता को रिकॉर्ड मतों से शिकस्त देकर संसद में अपनी जगह बनाई। उस वक्त ऐसा लगा था कि जनता का यह अपार प्रेम उन्हें राजनीति के शिखर पर ले जाएगा, लेकिन जल्द ही उन्हें यह महसूस होने लगा कि फिल्म के सेट और संसद के गलियारों के बीच एक गहरी खाई है जिसे पार करना उनके बस की बात नहीं थी।

राजनीति के उस छोटे से सफर में अमिताभ बच्चन ने जमीनी हकीकत को बहुत करीब से देखा। उन्होंने महसूस किया कि ग्रामीण भारत के लोग कितने सीधे और सरल हैं, जो अपने नेता को देवता की तरह पूजते हैं। हालांकि, व्यवस्था के भीतर की पेचीदगियों और हर तरफ से आने वाले सवालों ने उन्हें बेचैन करना शुरू कर दिया था। उनके लिए यह समझना मुश्किल हो रहा था कि किस तरफ बात करनी है और विरोधियों के तीखे हमलों का जवाब कैसे देना है। उन्होंने बाद के वर्षों में स्वीकार किया कि वह राजनीति के लिए बने ही नहीं थे और उनका वहां जाना पूरी तरह से एक भावुक निर्णय था। वह दो साल उनके जीवन के लिए बहुत कीमती रहे क्योंकि उन्होंने वहां से भारत की असली आत्मा को समझा, लेकिन इसके बदले उन्हें जो मानसिक शांति खोनी पड़ी, वह बहुत बड़ी कीमत थी।

अमिताभ बच्चन के राजनीतिक करियर का दुखद अंत तब हुआ जब बोफोर्स घोटाले की आग ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया। इस विवाद में उनका नाम भी घसीटा गया, जिसने महानायक की बेदाग छवि को जनता की नजरों में संदिग्ध बना दिया। उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया था और विरोधियों के लगातार बढ़ते दबाव के बीच उन्होंने 1987 में अपने पद से इस्तीफा देना ही बेहतर समझा। यह मामला उनके जीवन पर एक काले साये की तरह करीब ढाई दशक तक मंडराता रहा। हालांकि लंबी कानूनी लड़ाई के बाद साल 2012 में उन्हें पूरी तरह निर्दोष घोषित कर दिया गया, लेकिन यह न्याय मिलने में बहुत देर हो चुकी थी। उनके माता-पिता उनकी बेगुनाही देखे बिना ही दुनिया से चले गए, जिसका दुख आज भी उनके शब्दों में झलकता है।

अपने उस दौर को याद करते हुए अमिताभ बच्चन ने इसे ‘नरक’ के समान बताया था। उन्होंने साझा किया कि किस तरह उन्हें और उनके परिवार को निशाना बनाया गया और कई बड़े नेताओं ने उन्हें अपनी जान के खतरे तक की चेतावनी दी थी। जिस इंसान ने कभी राजनीति में आने का सपना भी नहीं देखा था, उसे व्यवस्था के सबसे क्रूर रूप का सामना करना पड़ा। इस कड़वे अनुभव के बाद उन्होंने कसम खा ली कि वह फिर कभी सक्रिय राजनीति का हिस्सा नहीं बनेंगे। आज जब वह पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वह उन दो सालों को एक ऐसी सीख मानते हैं जिसने उन्हें यह समझा दिया कि हर सफल अभिनेता एक सफल राजनेता नहीं हो सकता और हर मैदान हर किसी के लिए नहीं बना होता।

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