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1991 का आर्थिक संकट: जब भारत ने सोना गिरवी रखकर बदली अपनी किस्मत



नई दिल्ली। भारत के आर्थिक इतिहास में 1991 का साल एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। उस समय देश गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से गुजर रहा था और स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि सरकार को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए सोने का सहारा लेना पड़ा।

कैसे पैदा हुआ आर्थिक संकट?
1991 के दौरान भारत कई आर्थिक चुनौतियों से घिरा हुआ थाविदेशी मुद्रा भंडार बहुत तेजी से घट गया थादेश के पास कुछ ही दिनों के आयात के लिए पैसा बचा थाखाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ गई थींनिर्यात में गिरावट और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा था
इन परिस्थितियों ने देश को डिफॉल्ट की कगार पर पहुंचा दिया था।

क्यों गिरवी रखना पड़ा सोना?
संकट इतना गहरा था कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को तत्काल कदम उठाना पड़ा। विदेशी कर्ज चुकाने के लिए फंड की जरूरत थीअंतरराष्ट्रीय बाजार में भरोसा बनाए रखना जरूरी थाभुगतान संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका थाऐसे में भारत ने अपने स्वर्ण भंडार को गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा सहायता जुटाई।

कितना सोना इस्तेमाल हुआ?
रिपोर्ट्स के अनुसार उस समय लगभग 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान को भेजा गया।करीब 20 टन सोना स्विट्जरलैंड के बैंक के पास गिरवी रखा गया यह सोना देश की अर्थव्यवस्था को तुरंत राहत देने के लिए इस्तेमाल किया गया।

किसने संभाली जिम्मेदारी?
इस कठिन फैसले के पीछे देश की आर्थिक टीम शामिल थीतत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखरअर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंहवित्त मंत्री यशवंत सिन्हाRBI के वरिष्ठ अधिकार यह निर्णय बेहद गोपनीय तरीके से लिया गया था ताकि बाजार में घबराहट न फैले।

कैसे भेजा गया सोना?
मुंबई एयरपोर्ट से विशेष सुरक्षा में सोना विदेश भेजा गया

इसे अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय बैंकों में गिरवी रखा गया

इसके बदले भारत को तत्काल विदेशी मुद्रा सहायता मिली

क्या मिला फायदा?
इस कदम के बादभारत को तत्काल आर्थिक राहत मिलीदेश डिफॉल्ट होने से बच गयाबाद में 1991 के आर्थिक सुधारों का रास्ता खुला।  यही सुधार आगे चलकर भारत की उदारीकरण नीति की नींव बने।1991 का सोना गिरवी संकट भारत के लिए एक चेतावनी था कि आर्थिक अनुशासन कितना जरूरी है।उस समय लिए गए कठिन फैसलों ने देश को दिवालिया होने से बचाया और एक नई आर्थिक दिशा दी।

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