रिपोर्ट के अनुसार इस अवधि में नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट में भी वृद्धि देखने को मिल सकती है, जिसका अनुमान लगभग 97.8 अरब डॉलर लगाया गया है। इसके अलावा नॉन-ऑयल और नॉन-जेम्स एंड ज्वेलरी निर्यात में भी लगभग 3 प्रतिशत की सालाना बढ़त की संभावना जताई गई है, जो यह दर्शाता है कि भारत का निर्यात आधार धीरे-धीरे अधिक संतुलित और विविध हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय निर्यात में यह सुधार कई कारकों का परिणाम है। इनमें वैश्विक बाजारों में बढ़ती मांग, व्यापारिक अवसरों का विस्तार और निर्यातकों को मिल रहे नीतिगत सहयोग शामिल हैं। इसके साथ ही सरकार द्वारा समय-समय पर किए गए आर्थिक हस्तक्षेप और वित्तीय सहायता उपायों ने भी निर्यात गतिविधियों को स्थिरता प्रदान की है।
आर्थिक आकलन में यह भी बताया गया है कि हाल के वर्षों में भारत ने कई देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत किया है, जिसका सीधा असर निर्यात क्षेत्रों पर दिखाई दे सकता है। इन समझौतों से विशेष रूप से नॉन-ऑयल सेक्टर को फायदा मिलने की उम्मीद है, जिससे औद्योगिक उत्पादन और निर्यात दोनों को गति मिल सकती है।
इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में यदि मांग में सुधार आता है और मुद्रा विनिमय दरें अनुकूल बनी रहती हैं, तो भारत के निर्यात प्रदर्शन में और बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इससे भारतीय उत्पादों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता भी बढ़ेगी।
हालांकि रिपोर्ट में कुछ जोखिमों की ओर भी इशारा किया गया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों में उतार-चढ़ाव ऐसे कारक हैं जो निर्यात वृद्धि की गति को प्रभावित कर सकते हैं। इन परिस्थितियों में व्यापारिक स्थिरता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
इसके बावजूद निर्यात क्षेत्र को लेकर सकारात्मक माहौल बना हुआ है। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि वर्तमान नीतिगत समर्थन और वैश्विक परिस्थितियां संतुलित रहती हैं, तो भारत आने वाले समय में अपने निर्यात स्तर को और ऊंचाई तक ले जा सकता है।