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चीन के भरोसे शुरू हुआ पाकिस्तान का हैंगोर-क्लास पनडुब्बी प्रोजेक्ट, कराची शिपयार्ड में अटका काम; तकनीकी क्षमता पर उठे सवाल



नई दिल्ली। पाकिस्तान की नौसेना को मजबूत करने के लिए शुरू किया गया हैंगोर-क्लास पनडुब्बी प्रोजेक्ट अब गंभीर चुनौतियों में फंसता नजर आ रहा है। चीन के सहयोग से चल रही इस महत्वाकांक्षी योजना को लेकर अब कराची शिपयार्ड एंड इंजीनियरिंग वर्क्स (KSEW) की तकनीकी क्षमता और निर्माण प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं।

पाकिस्तान ने चीन के साथ मिलकर कुल 8 आधुनिक हैंगोर-क्लास पनडुब्बियां बनाने का समझौता किया था, जिनमें से 4 का निर्माण पाकिस्तान में स्थानीय स्तर पर करने का दावा किया गया था। सरकार ने इसे देश की नौसैनिक आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बताया था, लेकिन अब स्थिति उम्मीद के मुताबिक नहीं दिख रही है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, कराची शिपयार्ड को जिन पनडुब्बियों के निर्माण की जिम्मेदारी दी गई है, उसके पास पहले से किसी भी सबमरीन को बनाने का कोई अनुभव नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि पनडुब्बी निर्माण बेहद जटिल तकनीकी प्रक्रिया है, जिसमें उच्च गुणवत्ता वाली धातु, प्रेशर-रेजिस्टेंट ढांचा, एडवांस वेल्डिंग तकनीक और सख्त परीक्षण प्रणाली की जरूरत होती है।

इसी वजह से दुनिया में केवल कुछ ही देश जैसे अमेरिका, रूस, चीन और जर्मनी इस तकनीक में पूरी तरह सक्षम माने जाते हैं। यहां तक कि कई विकसित देशों को भी पनडुब्बी तकनीक विकसित करने में दशकों लग गए हैं।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत, दक्षिण कोरिया, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के उदाहरण बताते हैं कि पनडुब्बी निर्माण क्षमता विकसित करना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। ऐसे में पाकिस्तान की ओर से तेजी से स्थानीय निर्माण का दावा तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, फरवरी 2025 में कराची शिपयार्ड में छठी पनडुब्बी की नींव रखी गई थी, लेकिन परियोजना की प्रगति धीमी बनी हुई है। अब अनुमान लगाया जा रहा है कि इन पनडुब्बियों की पूरी डिलीवरी 2030 के दशक की शुरुआत तक ही संभव हो पाएगी।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस पूरे प्रोजेक्ट में चीन की भूमिका बेहद अहम है और डिजाइन से लेकर तकनीकी सहायता तक अधिकांश काम उसी पर निर्भर है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पाकिस्तान वास्तव में पनडुब्बी निर्माण में आत्मनिर्भर बन रहा है या सिर्फ असेंबली स्तर पर काम कर रहा है।

रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि अगर निर्माण में गुणवत्ता और तकनीकी मानकों से समझौता किया गया, तो यह समुद्री सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। फिलहाल यह प्रोजेक्ट पाकिस्तान के लिए रणनीतिक महत्व का जरूर है, लेकिन इसकी रफ्तार और गुणवत्ता दोनों पर निगरानी बनी हुई है।

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