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जमीन विवाद में मां को ही बेघर करने पर उतारू हुए बेटे, पंचायत में मांगी माफी


मध्यप्रदेश । मध्यप्रदेश के विदिशा जिले से रिश्तों को झकझोर देने वाला एक मामला सामने आया है, जहां 7 बेटों और 3 बेटियों की मां अपने ही परिवार के बीच अकेली पड़ गई। जमीन विवाद ने परिवार में ऐसी दरार पैदा कर दी कि बुजुर्ग मां को पंचायत का सहारा लेना पड़ा। हालांकि, पंचायत की समझाइश और सामाजिक दबाव के बाद बेटों ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए मां के पैर छूकर माफी मांगी।

बताया जा रहा है कि परिवार में जमीन को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। आरोप है कि कुछ बेटों ने मां की जमीन पर कब्जा कर लिया और उन्हें ही घर तथा संपत्ति के अधिकार से दूर करने की कोशिश की। इस स्थिति से परेशान बुजुर्ग महिला ने गांव की पंचायत में गुहार लगाई। मामला सामने आने के बाद गांव में चर्चा का विषय बन गया और पंचायत ने दोनों पक्षों को बुलाकर समझाइश दी।

पंचायत में जब मां ने अपनी पीड़ा सुनाई तो वहां मौजूद लोग भावुक हो गए। बुजुर्ग महिला ने कहा कि जिन बच्चों को उसने पाल-पोसकर बड़ा किया, वही आज उसे अकेला छोड़ रहे हैं। मां की बात सुनकर पंचायत प्रतिनिधियों ने बेटों को फटकार लगाई और परिवार की जिम्मेदारी समझाई।

समझाइश के दौरान पंचायत ने साफ कहा कि माता-पिता का सम्मान करना केवल नैतिक जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि सामाजिक कर्तव्य भी है। पंचायत के हस्तक्षेप और ग्रामीणों की मौजूदगी में बेटों ने अपनी गलती मानी और मां के पैर छूकर माफी मांगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि आगे से मां का पूरा सम्मान किया जाएगा और जमीन विवाद को आपसी सहमति से सुलझाया जाएगा।

इस घटना ने गांव में परिवार और रिश्तों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। ग्रामीणों का कहना है कि संपत्ति और जमीन के विवाद अब रिश्तों पर भारी पड़ते जा रहे हैं। जहां पहले संयुक्त परिवारों में आपसी सहयोग और सम्मान की भावना दिखाई देती थी, वहीं अब कई मामलों में माता-पिता तक को उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है।

पंचायत के सदस्यों ने भी लोगों से अपील की कि परिवारिक विवादों को आपसी बातचीत और समझदारी से सुलझाया जाए, ताकि रिश्तों में कड़वाहट न आए। उन्होंने कहा कि बुजुर्ग माता-पिता का सम्मान हर संतान का पहला कर्तव्य होना चाहिए।

हालांकि पंचायत में समझौते के बाद फिलहाल मामला शांत हो गया है, लेकिन यह घटना समाज के सामने एक बड़ा सवाल भी छोड़ गई है कि आखिर आधुनिक दौर में रिश्तों की अहमियत क्यों कम होती जा रही है। जिस मां ने अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष किया, वही मां अपने बुढ़ापे में सम्मान और सहारे के लिए पंचायत के सामने गुहार लगाने को मजबूर हो गई।

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