हालांकि इस पूरे मुद्दे पर सामने आए आधिकारिक और उपलब्ध आंकड़े सांसद के दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करते हैं। जनसंख्या और रोजगार से जुड़े आंकड़ों के अनुसार जिस निर्वाचन क्षेत्र का उल्लेख किया गया, वहां भारतीय और पाकिस्तानी मूल के निवासियों की संख्या कुल आबादी का बहुत छोटा हिस्सा है, जो एक प्रतिशत से भी कम बैठता है। ऐसे में यह दावा कि प्रवासी बड़े पैमाने पर स्थानीय लोगों की नौकरियां छीन रहे हैं, आंकड़ों के आधार पर मजबूत नहीं माना जा रहा है।
रोजगार से जुड़े व्यापक आंकड़े यह संकेत देते हैं कि ब्रिटेन के श्रम बाजार में बड़ी संख्या में गैर-स्थानीय नागरिक विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं, लेकिन इसका कारण स्थानीय स्तर पर कई उद्योगों में कर्मचारियों की कमी बताया जाता है। विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवा और देखभाल जैसे क्षेत्रों में लंबे समय से कर्मचारियों की कमी बनी हुई है, जिसे पूरा करने के लिए विदेशी श्रमिकों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। कई रिपोर्ट्स के अनुसार इन क्षेत्रों में प्रवासी कर्मचारियों की भागीदारी आवश्यकताओं के अनुसार बढ़ी है, न कि स्थानीय रोजगार को प्रभावित करने के उद्देश्य से।
इसके साथ ही सामाजिक लाभों को लेकर भी गलत धारणाओं का मुद्दा सामने आया है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि विदेशी नागरिकों की तुलना में स्थानीय नागरिकों की हिस्सेदारी कई मामलों में अधिक या समान बनी रहती है। वीजा नियमों के तहत आने वाले अधिकांश प्रवासी सार्वजनिक धन से मिलने वाले लाभों के लिए पात्र भी नहीं होते, जिससे यह दावा और कमजोर हो जाता है कि वे प्रणाली पर अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं।
इस पूरे विवाद ने ब्रिटेन में प्रवासन नीति और रोजगार संतुलन को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है, जहां एक तरफ राजनीतिक बयानबाजी है तो दूसरी तरफ आंकड़ों पर आधारित वास्तविकता। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मुद्दों पर भावनात्मक बयानों की बजाय तथ्यों और डेटा के आधार पर चर्चा होना जरूरी है, ताकि समाज में भ्रम और तनाव की स्थिति न बने और वास्तविक आर्थिक जरूरतों को सही तरीके से समझा जा सके।