वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार पिछले एक महीने से जिले के विभिन्न क्षेत्रों में नीलगायों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही थी। इस दौरान 13 से 14 संभावित स्थानों का सर्वेक्षण किया गया। नीलगायों के झुंड के आकार, उनके आने-जाने के रास्तों और गतिविधियों का अध्ययन करने के बाद अभियान के लिए उपयुक्त स्थानों का चयन किया गया है।
इस विशेष अभियान के लिए करीब डेढ़ हेक्टेयर क्षेत्र में एक विशाल घेराबंदी तैयार की जा रही है। बोमा तकनीक के तहत यह घेराबंदी फनल यानी कीप के आकार में बनाई जाती है, जिससे जानवरों को धीरे-धीरे एक सुरक्षित स्थान की ओर ले जाया जा सके। इसके निर्माण में मजबूत बाड़ और तिरपाल का उपयोग किया जा रहा है ताकि नीलगायों को बिना किसी चोट या तनाव के नियंत्रित किया जा सके।
वन विभाग की रणनीति के अनुसार बाड़ा तैयार होने के बाद शुरुआती दो से तीन दिनों तक वहां कोई विशेष गतिविधि नहीं की जाएगी। इस दौरान नीलगायों के लिए चारा और पानी की व्यवस्था की जाएगी ताकि वे स्वाभाविक रूप से उस स्थान पर आने लगें और नए वातावरण के अभ्यस्त हो सकें। इससे अभियान के दौरान उन्हें पकड़ना अपेक्षाकृत आसान और सुरक्षित रहेगा।
इस ऑपरेशन की खास बात यह है कि इसमें हेलीकॉप्टर, ट्रैंक्विलाइजर गन या अन्य महंगे संसाधनों का उपयोग नहीं किया जाएगा। वन विभाग पारंपरिक हांका पद्धति और आधुनिक निगरानी तकनीक का संयोजन अपनाएगा। ड्रोन के जरिए नीलगायों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाएगी, जबकि ग्रामीणों और वनकर्मियों की मदद से उन्हें धीरे-धीरे बोमा संरचना की ओर ले जाया जाएगा।
ऑपरेशन में लगभग 60 लोगों की टीम शामिल होगी। इसमें चार गांवों के ग्रामीण, वन विभाग के कर्मचारी और वन्यजीव विशेषज्ञ एक साथ काम करेंगे। अभियान को सफल बनाने के लिए राजगढ़ से तीन विशेषज्ञों की टीम उज्जैन पहुंच चुकी है। इसके अलावा शाजापुर वन विभाग की टीम भी अभियान के दौरान सहयोग करेगी।
वन विभाग का मानना है कि इस पहल से एक ओर किसानों की फसलों को होने वाले नुकसान में कमी आएगी, वहीं दूसरी ओर नीलगायों का सुरक्षित और मानवीय तरीके से पुनर्वास भी सुनिश्चित होगा। यदि यह अभियान सफल रहता है, तो भविष्य में प्रदेश के अन्य जिलों में भी इस मॉडल को अपनाया जा सकता है।