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भाजपा से अलग हुए के. अन्नामलाई, गठबंधन राजनीति से नाराजगी बनी वजह; नई राजनीतिक पारी की अटकलें तेज

नई दिल्ली । कर्नाटक में नई सरकार के गठन के कुछ ही समय बाद कांग्रेस के भीतर असंतोष और राजनीतिक खींचतान की खबरों ने राज्य की राजनीति को गर्मा दिया है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली नवगठित सरकार को उस समय बड़ा झटका लगा जब वरिष्ठ कांग्रेस नेता और आठ बार विधायक रह चुके रामलिंगा रेड्डी ने मंत्री पद से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। विभागों के आवंटन को लेकर उपजे विवाद ने सरकार के शुरुआती दिनों में ही राजनीतिक चुनौतियों को सामने ला दिया है।

मंत्रिमंडल गठन के बाद विभागों के बंटवारे की घोषणा होते ही पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चा शुरू हो गई थी। बताया गया कि रामलिंगा रेड्डी अपने पसंदीदा और लंबे समय से जुड़े माने जाने वाले बेंगलुरु विकास विभाग की जिम्मेदारी चाहते थे। हालांकि अंतिम सूची में यह विभाग किसी अन्य मंत्री को सौंप दिया गया, जबकि रेड्डी को प्रमुख और मध्यम सिंचाई विभाग की जिम्मेदारी दी गई। इसी फैसले से नाराज होकर उन्होंने अपना विरोध दर्ज कराया।

राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि बेंगलुरु विकास विभाग राज्य की राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे राजधानी से जुड़े कई विकास कार्यों और योजनाओं का सीधा संबंध रहता है। ऐसे में इस विभाग को लेकर पैदा हुआ विवाद केवल एक मंत्रालय का मुद्दा नहीं बल्कि राजनीतिक प्रभाव और क्षेत्रीय नेतृत्व से भी जुड़ा माना जा रहा है।

रामलिंगा रेड्डी ने अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी नेतृत्व उनके अनुभव और वरिष्ठता को ध्यान में रखेगा। उनके इस्तीफे के बाद कांग्रेस के भीतर चर्चा तेज हो गई है कि सरकार गठन के शुरुआती चरण में ही इस तरह का असंतोष भविष्य में और चुनौतियां पैदा कर सकता है। रेड्डी को राज्य की राजनीति में प्रभावशाली नेता माना जाता है और बेंगलुरु क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ रही है।

मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के लिए यह स्थिति एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा के रूप में देखी जा रही है। सरकार के गठन के बाद उनकी प्राथमिकता प्रशासनिक स्थिरता और संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना है। ऐसे समय में वरिष्ठ नेता का असंतोष विपक्ष को भी सरकार पर सवाल उठाने का अवसर दे सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस विवाद का जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो इसका असर सरकार की छवि पर पड़ सकता है।

कांग्रेस नेतृत्व भी पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा नाराज नेताओं से बातचीत कर स्थिति को सामान्य बनाने की कोशिशें किए जाने की संभावना जताई जा रही है। संगठन की कोशिश होगी कि सरकार के शुरुआती दिनों में किसी भी प्रकार का बड़ा राजनीतिक संदेश बाहर न जाए और आंतरिक मतभेदों को संवाद के माध्यम से सुलझाया जाए।

कर्नाटक की राजनीति में मंत्रिमंडल विस्तार और विभागों के आवंटन को लेकर असंतोष कोई नई बात नहीं है, लेकिन नई सरकार के गठन के तुरंत बाद सामने आया यह विवाद विशेष महत्व रखता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस नेतृत्व और मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार इस चुनौती से किस प्रकार निपटते हैं और क्या रामलिंगा रेड्डी को मनाकर सरकार के भीतर संतुलन बहाल किया जा सकेगा।

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