‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ मूल रूप से एक पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत है। फुलौरी एक लोकप्रिय पकवान है, जिसे आमतौर पर चटनी के साथ खाया जाता है। इसी वजह से गीत की पंक्ति ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ यह संदेश देती है कि कुछ चीजें एक-दूसरे के बिना अधूरी होती हैं। यही सरल लेकिन प्रभावी भाव इस गीत को आम लोगों से जोड़ता है।
इतिहासकारों के अनुसार 19वीं सदी में भारत से त्रिनिदाद और टोबैगो सहित कई कैरेबियन देशों में गए गिरमिटिया मजदूर अपने साथ भोजपुरी भाषा, संस्कृति और लोकगीतों की विरासत भी लेकर गए थे। उन्हीं गीतों में ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ भी शामिल था। समय के साथ यह गीत वहां की स्थानीय संस्कृति का हिस्सा बन गया और पीढ़ी दर पीढ़ी गाया जाता रहा।
इस गीत को वैश्विक पहचान दिलाने का सबसे बड़ा श्रेय प्रसिद्ध गायक सुंदर पोपो को जाता है। ‘किंग ऑफ चटनी म्यूजिक’ के नाम से मशहूर सुंदर पोपो ने वर्ष 1969 के आसपास भोजपुरी लोकधुनों को कैरेबियन संगीत और आधुनिक बीट्स के साथ जोड़कर नया प्रयोग किया। उनके गाए ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ ने जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की। यही वह दौर था जब ‘चटनी म्यूजिक’ नाम की नई संगीत शैली दुनिया के सामने आई। भोजपुरी लोकसंगीत, भारतीय सुरों और कैरेबियन लय का यह अनोखा संगम लोगों को बेहद पसंद आया।
भारत में इस गीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का काम बाबला और कंचन की मशहूर जोड़ी ने किया। 1980 के दशक में उनके द्वारा पेश किया गया संस्करण सुपरहिट साबित हुआ। बड़ी संख्या में भारतीय श्रोताओं ने पहली बार इसी वर्जन के जरिए इस गीत को सुना। इसके बाद भोजपुरी संगीत जगत ने भी इस धुन को भरपूर अपनाया। लोकगायिका कल्पना पटवारी समेत कई कलाकारों ने अपने-अपने अंदाज में इसे गाया और यह गीत भोजपुरी संस्कृति का एक तरह से फोक एंथम बन गया।
बॉलीवुड भी इस लोकप्रिय धुन के आकर्षण से अछूता नहीं रहा। 1994 की फिल्म ‘घर की इज्जत’ में इसकी झलक दिखाई दी, लेकिन वर्ष 2012 में फिल्म ‘दबंग 2’ के जरिए इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम हुआ। ममता शर्मा और वाजिद अली की आवाज में आया यह संस्करण देशभर में हिट साबित हुआ और आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है।
अब एक बार फिर यह ऐतिहासिक धुन फिल्म ‘धमाल 4’ के जरिए दर्शकों के सामने लौट रही है। हाल ही में रिलीज हुए ‘चटनी’ गीत में रितेश देशमुख, अरशद वारसी, जावेद जाफरी और अंजलि देशपांडे मस्ती भरे अंदाज में नजर आ रहे हैं। गीत को आधुनिक संगीत के साथ पेश किया गया है, लेकिन इसकी लोकधुन आज भी वैसी ही ताजगी और अपनापन लिए हुए है।
भोजपुरी गांवों से शुरू होकर कैरेबियन देशों तक और फिर बॉलीवुड की चमकदार दुनिया तक पहुंचने वाला ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति की वैश्विक यात्रा का प्रतीक है। यही वजह है कि बदलते दौर, बदलती पीढ़ियों और नए संगीत ट्रेंड्स के बावजूद इस गीत का जादू आज भी कायम है।