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जुबली गर्ल आशा पारेख के त्याग की अनकही दास्तान: शादीशुदा फिल्ममेकर से बेइंतहा मोहब्बत के बाद भी ताउम्र क्यों कुंवारी रहीं दिग्गज अभिनेत्री

नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में साठ और सत्तर के दशक में सिल्वर स्क्रीन
 राज करने वाली सदाबहार अभिनेत्री आशा पारेख की पेशेवर जिंदगी जितनी चकाचौंध और सफलताओं से भरी रही, उनकी निजी जिंदगी में उतनी ही खामोशी और त्याग की एक अनूठी कहानी छिपी रही। अपनी बेमिसाल खूबसूरती और बेहतरीन अभिनय के दम पर करोड़ों प्रशंसकों को अपना दीवाना बनाने वाली इस महान अदाकारा ने अपनी असल जिंदगी में प्यार की एक ऐसी गरिमापूर्ण मिसाल पेश की, जिसकी चर्चा आज भी बॉलीवुड के गलियारों में बेहद सम्मान के साथ की जाती है। उन्होंने एक शादीशुदा मर्द से सच्ची मोहब्बत तो की, लेकिन समाज में ‘घर तोड़ने वाली’ कहलाने का कलंक झेलने की बजाय ताउम्र कुंवारी रहने का रास्ता चुना।

इस निश्छल और मूक प्रेम कहानी की शुरुआत वर्ष उन्नीस सौ उनसठ में हुई थी, जब मशहूर फिल्म निर्माता और निर्देशक नासिर हुसैन ने युवा आशा पारेख की प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें अपनी फिल्म ‘दिल देके देखो’ में मुख्य अभिनेत्री के तौर पर एक बड़ा ब्रेक दिया था। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई और इसके बाद इस जोड़ी ने एक के बाद एक कई शानदार और जुबली फिल्में सिनेमा जगत को दीं। सेट पर एक साथ लगातार काम करने के दौरान आशा पारेख कब अपने निर्देशक को दिल दे बैठीं, उन्हें खुद भी इसका अहसास नहीं हुआ और दूसरी तरफ नासिर हुसैन के दिल में भी उनके लिए वही सम्मानजनक भावनाएं थीं।

नासिर हुसैन के लिए अपने दिल में बेइंतहा मोहब्बत और कशिश होने के बावजूद आशा पारेख ने कभी भी अपने हक के लिए उनके सामने कोई जिद या शर्त नहीं रखी। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यह थी कि नासिर हुसैन पहले से ही शादीशुदा थे और बाल-बच्चों के साथ एक खुशहाल जीवन बिता रहे थे। अभिनेत्री के भीतर के नैतिक मूल्यों ने उन्हें कभी इस बात की इजाजत नहीं दी कि उनके व्यक्तिगत सुख या प्यार की खातिर किसी दूसरी औरत का सुहाग और एक हंसता-खेलता परिवार हमेशा के लिए बिखर जाए। उन्होंने अपने दिल की आवाज को दबाकर दूसरे के आशियाने की हिफाजत करना ज्यादा जरूरी समझा।

दशकों तक इस खामोश दर्द और मोहब्बत को अपने सीने में दफन रखने के बाद, आशा पारेख ने वर्ष दो हजार सत्रह में प्रकाशित हुई अपनी आत्मकथा ‘द हिट गर्ल’ में इस राज से पर्दा उठाया था। उन्होंने बेहद भावुक शब्दों में स्वीकार किया था कि नासिर हुसैन ही उनकी जिंदगी के एकमात्र ऐसे पुरुष थे जिनसे उन्होंने बेहद शिद्दत से प्यार किया था। लेकिन किसी का घर उजाड़कर अपनी खुशियों का महल खड़ा करना उनके संस्कारों के खिलाफ था, यही वजह थी कि उन्होंने नासिर हुसैन पर शादी का दबाव बनाने की बजाय खुद अकेले जिंदगी काटने का एक बेहद कठिन और साहसिक निर्णय लिया।

अपनी पूरी जिंदगी तन्हाई और अकेलेपन में गुजारने के बाद भी इस उम्र में पद्मश्री और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित अभिनेत्री के मन में अपने अतीत के फैसलों को लेकर कोई मलाल, कड़वाहट या शिकायत नहीं है। उनका हमेशा से यह दृढ़ विश्वास रहा है कि किसी दूसरे को दुख देकर हासिल की गई खुशी कभी भी स्थायी और सच्ची नहीं हो सकती। आज बयासी वर्ष से अधिक की उम्र पार कर चुकीं आशा पारेख अपने इस फैसले पर अडिग रहते हुए पूरे आत्मसम्मान, सुकून और गरिमा के साथ अपनी एकाकी जिंदगी का आनंद ले रही हैं, जो आज के दौर के रिश्तों के लिए एक बहुत बड़ी नजीर है।

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