नई दिल्ली । आधार कार्ड के उपयोग और उसकी कानूनी सीमा को लेकर एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों, केंद्रशासित प्रदेशों और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने उस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि आधार कार्ड का इस्तेमाल नागरिकता, निवास और पते के प्रमाण के रूप में किया जा रहा है, जबकि कानून इसकी अनुमति नहीं देता। मामले की अगली सुनवाई 7 अगस्त को निर्धारित की गई है।
याचिका में कहा गया है कि भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) द्वारा जारी आधार कार्ड का मूल उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति की पहचान की पुष्टि करना है। इसके बावजूद कई सरकारी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में इसे नागरिकता, स्थायी निवास, जन्मतिथि और पते के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। याचिकाकर्ता ने इसे आधार अधिनियम की भावना और कानूनी प्रावधानों के विपरीत बताया है।
मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र और राज्यों से यह स्पष्ट करने को कहा है कि आधार कार्ड के उपयोग को निर्धारित कानूनी सीमाओं के भीतर रखने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि विभिन्न सरकारी प्रक्रियाओं में आधार को किस प्रकार स्वीकार किया जा रहा है और क्या इसके उपयोग में निर्धारित नियमों का पालन किया जा रहा है।
याचिका में विशेष रूप से नए मतदाता पंजीकरण से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। दावा किया गया है कि वोटर रजिस्ट्रेशन के दौरान कुछ स्थानों पर आधार कार्ड को जन्मतिथि और पते के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह व्यवस्था कानूनी रूप से उचित नहीं है, क्योंकि आधार अधिनियम में स्पष्ट उल्लेख है कि आधार नागरिकता या निवास का प्रमाण नहीं माना जाएगा।
याचिका में अदालत से यह भी अनुरोध किया गया है कि केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और चुनाव आयोग को निर्देश दिए जाएं ताकि आधार कार्ड का उपयोग केवल पहचान सत्यापन तक सीमित रखा जा सके। इसके अलावा सभी संबंधित संस्थाओं को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है, जिससे किसी भी प्रकार की कानूनी भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि आधार देश की सबसे बड़ी डिजिटल पहचान प्रणाली है और करोड़ों लोग विभिन्न सरकारी योजनाओं, बैंकिंग सेवाओं तथा अन्य सुविधाओं के लिए इसका उपयोग करते हैं। ऐसे में इसके उपयोग की सीमा और कानूनी स्थिति को लेकर स्पष्टता बेहद आवश्यक है। यदि विभिन्न विभाग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए आधार को स्वीकार करते हैं, तो इससे प्रशासनिक और कानूनी विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे भविष्य में आधार कार्ड की वैधानिक भूमिका और उसकी स्वीकार्यता को लेकर व्यापक दिशा-निर्देश तय हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय का प्रभाव चुनावी प्रक्रियाओं, सरकारी सेवाओं और पहचान सत्यापन से जुड़ी कई व्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।
फिलहाल अदालत ने सभी पक्षों से जवाब मांगा है और मामले की सुनवाई आगे जारी रहेगी। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और राज्य सरकारें अदालत के समक्ष क्या पक्ष रखती हैं तथा आधार कार्ड के उपयोग को लेकर भविष्य में क्या स्पष्ट दिशा-निर्देश सामने आते हैं।