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मनुआभान टेकरी कांड में बड़ा फैसला: नाबालिग से दुष्कर्म और हत्या के दोषियों को उम्रकैद, डीएनए साक्ष्यों ने दिलाई सजा


भोपाल । भोपाल के बहुचर्चित मनुआभान टेकरी दुष्कर्म एवं हत्या कांड में आखिरकार न्यायालय का बड़ा फैसला सामने आया है। विशेष न्यायाधीश कुमुदिनी पटेल की अदालत ने मामले के दोनों आरोपियों अविनाश साहू और जस्टिन राज को दोषी ठहराते हुए शेष प्राकृतिक जीवन तक सश्रम आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही दोनों पर 8-8 हजार रुपए का अर्थदंड भी लगाया गया है। इस फैसले के साथ वर्षों से चल रहे इस संवेदनशील मामले का महत्वपूर्ण कानूनी अध्याय समाप्त हुआ है।

यह मामला वर्ष 2019 में सामने आया था और उस समय पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया था। घटना 30 अप्रैल 2019 की है, जब आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक नाबालिग छात्रा अपनी 16 वर्षीय बुआ और उसके मित्र अविनाश साहू के साथ मनुआभान टेकरी घूमने गई थी। आरोप है कि टेकरी पर दोनों आरोपियों ने नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया और फिर पहचान छिपाने के उद्देश्य से पत्थर से उसका सिर कुचलकर हत्या कर दी। वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपियों ने शव को लगभग 100 फीट गहरी खाई में स्थित एक गुफा में छिपा दिया था ताकि किसी को घटना की जानकारी न मिल सके।

घटना के बाद आरोपी खुद को निर्दोष साबित करने के लिए छात्रा की तलाश का नाटक करते रहे। जब बालिका के लापता होने की सूचना पुलिस को मिली तो कोहेफिजा थाना पुलिस ने पूरी रात सर्च ऑपरेशन चलाया, लेकिन शुरुआत में कोई सफलता नहीं मिली। जांच के दौरान पुलिस को अविनाश साहू के बयानों में लगातार विरोधाभास दिखाई दिया। संदेह गहराने पर पुलिस ने उससे गहन पूछताछ की, जिसके बाद उसने पूरी वारदात कबूल कर ली। आरोपी की निशानदेही पर पुलिस ने खाई में छिपाया गया छात्रा का शव बरामद किया।

जांच के दौरान पुलिस ने डीएनए रिपोर्ट, मेडिकल परीक्षण और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों को एकत्रित किया। पॉक्सो एक्ट, दुष्कर्म, हत्या और अन्य गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज कर अदालत में चालान पेश किया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने की सिफारिश भी की थी।

हालांकि बाद में सीबीआई ने पुलिस की डीएनए रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए दोनों आरोपियों को क्लीन चिट देने का प्रयास किया और अदालत में क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। लेकिन अदालत ने सीबीआई की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया और उससे विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा। इसके बाद मामले का ट्रायल जारी रहा और उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयान तथा वैज्ञानिक जांच रिपोर्टों का गहन परीक्षण किया गया।

लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में सफल रहा है। न्यायालय ने माना कि प्रस्तुत साक्ष्य आरोपियों की संलिप्तता को स्पष्ट रूप से साबित करते हैं। इसी आधार पर दोनों दोषियों को कठोर सजा सुनाई गई।

यह फैसला न केवल पीड़ित परिवार के लिए न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ गंभीर अपराधों में वैज्ञानिक साक्ष्य और सतत न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से दोषियों को कानून के दायरे में लाया जा सकता है। प्रदेश के चर्चित मामलों में शामिल इस प्रकरण में आया फैसला न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों के विश्वास को भी मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

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