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महाराष्ट्र की सियासत में ओमराजे निंबालकर बने गेमचेंजर, उद्धव-शिंदे की बाजी पर टिकी नजरें


नई दिल्ली । महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर तीव्र सियासी हलचल के दौर में है जहां शिवसेना के दो धड़ों उद्धव ठाकरे गुट और एकनाथ शिंदे गुट के बीच शक्ति संतुलन की जंग और तेज हो गई है। इस पूरे राजनीतिक समीकरण के केंद्र में इस समय धाराशिव से सांसद ओमराजे निंबालकर का रुख सबसे अहम माना जा रहा है जिनका संभावित फैसला दोनों खेमों की रणनीति को सीधे प्रभावित कर सकता है।

ओमराजे निंबालकर को लेकर सस्पेंस इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि हाल ही में उनके परिवार से जुड़े पुराने पवनराजे निंबालकर हत्याकांड मामले में अदालत ने आरोपियों को बरी कर दिया है। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल और तेज हो गई है। उद्धव गुट के नेता लगातार उन्हें अपने साथ बनाए रखने की कोशिश में जुटे हैं जबकि शिंदे गुट भी इस समीकरण में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सक्रिय दिखाई दे रहा है।

सूत्रों के मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम के बीच ऑपरेशन टाइगर की चर्चा भी तेज है जिसके तहत कुछ सांसदों और विधायकों के पाला बदलने की संभावनाएं जताई जा रही हैं। कहा जा रहा है कि यदि उद्धव गुट के कुछ सांसद शिंदे गुट में शामिल होते हैं तो संख्या बल का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है। ऐसे में ओमराजे निंबालकर का रुख निर्णायक साबित हो सकता है।

ओमराजे ने अभी तक किसी भी गुट के पक्ष में खुलकर बयान नहीं दिया है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में स्पष्ट किया कि वे अपने भविष्य का फैसला अपने क्षेत्र के लोगों और समर्थकों से चर्चा के बाद ही करेंगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने उद्धव ठाकरे या आदित्य ठाकरे के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की है और न ही भविष्य में ऐसी कोई बात करने का इरादा रखते हैं।

इस बीच शिवसेना (यूबीटी) की ओर से उनके संपर्क में रहने की कोशिशें जारी हैं। वहीं पार्टी की ओर से जारी व्हिप के बावजूद उनकी अनुपस्थिति ने सियासी अटकलों को और हवा दे दी है। दूसरी ओर पार्टी ने कुछ सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी कर स्थिति को गंभीर बना दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र की मौजूदा सियासी जंग में यह सिर्फ एक व्यक्ति का फैसला नहीं बल्कि पूरे शक्ति संतुलन का मुद्दा बन चुका है। उद्धव और शिंदे दोनों ही गुट इस समय रणनीतिक बढ़त लेने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं और आने वाले दिनों में ओमराजे निंबालकर का रुख इस पूरे राजनीतिक खेल की दिशा तय कर सकता है।

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