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इमरजेंसी की 51वीं बरसी पर प्रधानमंत्री मोदी का बड़ा संदेश, बोले- संविधान पर हमला था वह दौर, नहीं भूल सकता देश लोकतंत्र का दर्द

नई दिल्ली । देश में लागू किए गए आपातकाल की 51वीं बरसी के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 1975 के उस दौर को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय बताया है। उन्होंने कहा कि आपातकाल केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि यह संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा प्रहार था। प्रधानमंत्री ने नागरिकों को उस कालखंड की याद दिलाते हुए लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के प्रति अपनी सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि भारत का संविधान देश के प्रत्येक नागरिक की आकांक्षाओं, अधिकारों और कर्तव्यों का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की शक्ति केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और संस्थागत मजबूती में भी निहित होती है। उनके अनुसार आपातकाल के दौरान इन मूलभूत सिद्धांतों को गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा था।

प्रधानमंत्री ने उस दौर को याद करते हुए कहा कि देश के नागरिकों से उनकी स्वतंत्रता छीन ली गई थी और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि आपातकाल भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे लोकतंत्र में विश्वास रखने वाला कोई भी नागरिक आसानी से नहीं भूल सकता। इस अवसर पर उन्होंने उन लोगों को भी श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया और कठिन परिस्थितियों का सामना किया।

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में उन अनगिनत नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं के साहस का विशेष उल्लेख किया, जिन्होंने दबाव और प्रतिबंधों के बावजूद लोकतंत्र की आवाज को जीवित रखा। उन्होंने कहा कि उस समय अनेक लोगों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। यही संघर्ष भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत और प्रेरणा का स्रोत बना।

भारत के राजनीतिक इतिहास में 25 जून 1975 की तारीख को विशेष महत्व प्राप्त है। इसी दिन तत्कालीन सरकार की सिफारिश पर देश में आपातकाल लागू किया गया था। संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत घोषित इस आपातकाल का आधार आंतरिक अशांति को बताया गया था। उस समय देश में व्यापक राजनीतिक गतिविधियां चल रही थीं और विभिन्न विपक्षी दल सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे।

आपातकाल लागू होने के बाद लगभग 21 महीनों तक देश ने असाधारण परिस्थितियों का सामना किया। इस अवधि में नागरिकों के कई मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाए गए और मीडिया पर कड़ी सेंसरशिप लागू की गई। समाचार पत्रों और प्रकाशनों को सामग्री प्रकाशित करने से पहले सरकारी अनुमति की आवश्यकता पड़ती थी। इसके अलावा अनेक विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को हिरासत में लिया गया था।

प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती संविधान के सम्मान और संस्थाओं की स्वतंत्रता में निहित होती है। उन्होंने भरोसा जताया कि देश आज पहले से अधिक जागरूक और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध है। उन्होंने न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को भारत की प्रगति का आधार बताते हुए इन्हीं मूल्यों के अनुरूप विकसित राष्ट्र के निर्माण का संकल्प दोहराया।

आपातकाल की 51वीं बरसी के अवसर पर दिया गया यह संदेश केवल इतिहास की एक घटना का स्मरण नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्ता को रेखांकित करने का प्रयास भी माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र की सफलता के लिए नागरिक अधिकारों, स्वतंत्र संस्थाओं और संवैधानिक मर्यादाओं का संरक्षण हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता बना रहना चाहिए।

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