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बिना बजट और बिना क्रू के रची गई कालजयी दास्तां: जब गांव के बच्चों की सादगी ने 'विलेज रॉकस्टार्स' को दिलाया नेशनल अवॉर्ड

नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा जगत में अमूमन करोड़ों रुपये के भारी-भरकम बजट, चमचमाती लाइट्स, नामचीन सितारों और सैकड़ों लोगों के क्रू को ही सफलता की गारंटी माना जाता है। लेकिन असम के एक सुदूर गांव से निकलकर आई एक छोटी सी फिल्म ने फिल्म निर्माण के इन तमाम स्थापित पैमानों और ढर्रों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। हम बात कर रहे हैं फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स’ की, जिसे भारतीय सिनेमा की एक ऐसी जादुई और ऐतिहासिक कृति माना जाता है, जिसने लगभग शून्य या कहें ना के बराबर संसाधनों के इस्तेमाल से बनकर सीधे देश का सर्वोच्च सिनेमाई सम्मान यानी नेशनल अवॉर्ड अपने नाम कर लिया था।

इस फिल्म के निर्माण की कहानी किसी सिनेमाई पटकथा से कम दिलचस्प नहीं है। फिल्म की निर्देशक रीमा दास ने इस पूरी परियोजना को बिना किसी बड़े प्रोड्यूसर या बैनर के सहयोग के अकेले ही शुरू किया था। उनके पास फिल्म बनाने के लिए भारी-भरकम बजट नहीं था, इतना कम फंड था कि जितने में शायद कोई शॉर्ट फिल्म बनाना भी मुमकिन नहीं होता। ऐसे में उन्होंने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए एक साधारण सा डीएसएलआर (DSLR) कैमरा उठाया और सीधे अपने पैतृक गांव की तरफ रुख कर लिया। इस छोटे और साधारण कैमरे का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि गांव के सीधे-साधे लोग कैमरे को देखकर बिल्कुल भी असहज नहीं हुए और उनके भीतर का स्वाभाविक अभिनय खुलकर सामने आ सका।

फिल्म की मेकिंग के दौरान संसाधनों की कमी को रीमा दास ने अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। फिल्म के पास न तो कोई लाइटिंग टीम थी और न ही लाइटमैन का कोई क्रू था। इस खर्च से बचने के लिए उन्होंने पूरी फिल्म की शूटिंग सुबह और शाम के समय मिलने वाली कुदरती और प्राकृतिक रोशनी में की। फिल्म में जब भी और जहां भी किसी अतिरिक्त तकनीकी मदद की जरूरत पड़ती, तो गांव के स्थानीय लोग खुद-ब-खुद आगे आकर हाथ बंटा देते थे। रीमा ने न केवल फिल्म का निर्देशन किया, बल्कि सिनेमैटोग्राफी, एडिटिंग, स्क्रीनप्ले और यहां तक कि कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग का जिम्मा भी खुद अपने कंधों पर उठाया।

फिल्म के लिए प्रोफेशनल एक्टर्स को हायर करना और उनके बजट का इंतजाम करना सबसे बड़ी चुनौती थी। इसका समाधान निकालने के लिए रीमा दास ने गांव के ही बच्चों को धीरे-धीरे अभिनय की बुनियादी ट्रेनिंग दी और उन्हें ही अपनी फिल्म के मुख्य किरदारों में कास्ट कर लिया। इन बच्चों के लिए यह पूरी तरह से सिनेमाई डेब्यू था, लेकिन स्क्रीन पर उनकी मासूमियत और सादगी ने ऐसा जादू बिखेरा कि बड़े-बड़े मंझे हुए कलाकार भी उनके सामने फीके नजर आने लगे। जब यह आसान और सादगी से भरी फिल्म बड़े पर्दे पर रिलीज हुई, तो इसने न केवल समीक्षकों को हैरान किया बल्कि नेशनल अवॉर्ड जीतकर इतिहास रच दिया।

इस अभूतपूर्व सफलता के बाद, साल 2024 में इस फिल्म का सीक्वल भी तैयार किया गया। दिलचस्प बात यह है कि इस दूसरे भाग के निर्माण में भी रीमा दास को उसी गांव के लोगों और बच्चों का पूरा सहयोग मिला, जिन्होंने पहली बार में फिल्म को फर्श से अर्श पर पहुंचाया था। भारतीय सिनेमा में न्यूनतम संसाधनों के साथ अधिकतम प्रभाव छोड़ने का यह अपनी तरह का इकलौता उदाहरण है। सादगी और कड़े संघर्ष से उपजी कला की यह अद्भुत मिसाल वर्तमान में ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर दर्शकों के लिए उपलब्ध है, जो स्वतंत्र सिनेमा के क्षेत्र में एक कड़े मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है।

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