बागी गुट की ओर से चुनाव आयोग के समक्ष यह दावा किया गया कि हाल ही में आयोजित प्रतिनिधि सम्मेलन में नई राष्ट्रीय समिति का गठन किया गया था। इसके बाद संगठनात्मक बदलाव की जानकारी आयोग को भेजी गई और आधिकारिक तौर पर पक्ष रखने का अवसर मांगा गया। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि उनके साथ बड़ी संख्या में विधायक, पार्षद और जिला परिषद सदस्य जुड़े हुए हैं, इसलिए वास्तविक बहुमत उनके पास है।
बागी नेताओं ने अपनी मुहिम को केवल नेतृत्व परिवर्तन का मामला नहीं बताया, बल्कि इसे संगठन की कार्यशैली से जुड़ा मुद्दा बताया। उनका कहना है कि पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर किया गया है और संगठन सीमित नेतृत्व के प्रभाव में सिमट गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि आंतरिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में व्यापक भागीदारी नहीं रही, जिसके कारण असंतोष लगातार बढ़ता गया।
गुट के नेताओं ने यह भी दावा किया कि वे स्वयं को तृणमूल कांग्रेस का वास्तविक प्रतिनिधि मानते हैं। उनका कहना है कि पार्टी की मूल विचारधारा और संगठनात्मक संरचना को बचाने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब चुनाव आयोग के समक्ष संगठन की वैधता और बहुमत से जुड़े सभी तथ्य प्रस्तुत किए जा चुके हैं तथा आगे का निर्णय संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार होगा।
राजनीतिक विवाद के बीच विधानसभा में विधायकों के समर्थन को लेकर भी अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। बागी गुट का कहना है कि उसके साथ बहुमत में विधायक मौजूद हैं और इसी आधार पर संगठन पर उसका दावा मजबूत है। दूसरी ओर, मूल नेतृत्व के समर्थक इन दावों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। ऐसे में वास्तविक संख्या और समर्थन को लेकर राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर स्थिति महत्वपूर्ण बनी हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच कुछ दस्तावेजों और हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता को लेकर भी विवाद सामने आया है। इसी संबंध में जांच की प्रक्रिया शुरू की गई है। जांच के बाद संबंधित नेताओं के खिलाफ संगठनात्मक कार्रवाई भी की गई, जिसके बाद पार्टी के भीतर मतभेद और खुलकर सामने आ गए। इसके बाद बड़ी संख्या में विधायकों ने अलग प्रस्ताव पेश करते हुए स्वयं को बहुमत वाला समूह बताया।
बाद के घटनाक्रम में विधानसभा स्तर पर भी नेतृत्व से जुड़े बदलाव देखने को मिले, जिससे राजनीतिक विवाद और गहरा गया। अब पूरे मामले पर सभी की नजर चुनाव आयोग की आगामी प्रक्रिया और संभावित निर्णय पर टिकी है। यदि बागी गुट अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज और संख्या प्रस्तुत करने में सफल रहता है तो राज्य की राजनीति में इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। वहीं यदि दावे सिद्ध नहीं होते हैं तो पार्टी का मौजूदा नेतृत्व अपनी स्थिति और मजबूत करने का प्रयास करेगा। आने वाले दिनों में यह मामला पश्चिम बंगाल की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम बन सकता है।