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इलेक्ट्रिक वाहनों की तेज रफ्तार से बदलेगी अर्थव्यवस्था, बढ़ती हिस्सेदारी से ईंधन आयात पर बड़ी बचत की उम्मीद

नई दिल्ली । भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती स्वीकार्यता आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। एक ताजा अध्ययन के अनुसार, यदि वर्ष 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहनों की बाजार हिस्सेदारी 20 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, तो देश के आयात बिल में करीब एक लाख करोड़ रुपये की कमी संभव है। ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटने से विदेशी मुद्रा की बचत होगी और परिवहन क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को भी मजबूती मिलेगी।

रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान में भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत के आसपास है। हाल के महीनों में ईवी पंजीकरण में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई है। मार्च से जून के दौरान प्रति माह औसतन 2.3 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों का पंजीकरण हुआ, जो पिछले वर्ष के मासिक औसत की तुलना में काफी अधिक है। मौजूदा रुझानों को देखते हुए अनुमान है कि वर्ष 2026 के अंत तक कुल ईवी पंजीकरण 25 लाख के आंकड़े को पार कर सकता है।

अध्ययन में यह भी बताया गया है कि पूरी तरह बैटरी आधारित इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। कुछ वर्ष पहले जहां इनकी हिस्सेदारी कुल पंजीकरण में दो प्रतिशत से भी कम थी, वहीं अब यह आठ प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। कई राज्यों में यह आंकड़ा दस प्रतिशत के स्तर को भी पार कर चुका है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि उपभोक्ताओं का भरोसा इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर तेजी से बढ़ रहा है।

हालांकि रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इलेक्ट्रिक वाहनों के व्यापक विस्तार के लिए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर सबसे महत्वपूर्ण आधार रहेगा। वर्तमान में देशभर में लगभग 29 हजार से अधिक सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन उपलब्ध हैं, लेकिन इनका बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा राज्यों तक सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि चार्जिंग सुविधाओं का समान विस्तार होने पर ही छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग तेजी से बढ़ सकेगी।

राजधानी दिल्ली की नई इलेक्ट्रिक वाहन नीति को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया गया है। नीति के तहत आने वाले वर्षों में हजारों नए चार्जिंग पॉइंट स्थापित करने की योजना बनाई गई है। इसके साथ ही दोपहिया, तिपहिया और हल्के वाणिज्यिक इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद पर वित्तीय प्रोत्साहन तथा रोड टैक्स और पंजीकरण शुल्क में छूट जैसे उपाय भी शामिल किए गए हैं। ऐसे कदम उपभोक्ताओं को इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि भारत में वाहनों की कुल संख्या अगले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ने वाली है। यदि इस वृद्धि का बड़ा हिस्सा इलेक्ट्रिक वाहनों के रूप में सामने आता है, तो इससे पेट्रोल और डीजल की मांग पर दबाव कम होगा। साथ ही कार्बन उत्सर्जन में कमी, ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती और स्वच्छ परिवहन प्रणाली के विकास जैसे दीर्घकालिक लाभ भी मिलेंगे। यही कारण है कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को आने वाले दशक में भारत की आर्थिक और पर्यावरणीय रणनीति का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है।

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