बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मुसहरी प्रखंड से करीब 18 किलोमीटर दूर स्थित नरौली गांव इसकी एक बड़ी मिसाल है। लगभग 250 परिवारों वाले इस गांव में अनुसूचित जाति पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग रहते हैं। अधिकांश परिवार दिहाड़ी मजदूरी खेती और छोटे-मोटे रोजगार पर निर्भर हैं। सीमित आय में किसी तरह परिवार का खर्च चलता है। ऐसे में यदि सरकारी योजनाओं का लाभ समय पर मिल जाए तो उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में बड़ा बदलाव आ सकता है लेकिन जानकारी और प्रक्रिया की बाधाओं के कारण कई परिवार इन सुविधाओं से वंचित हैं।
गांव के अनेक परिवार आज भी उज्ज्वला योजना का लाभ नहीं ले सके हैं। नतीजतन महिलाएं लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने को मजबूर हैं। रसोई का धुआं आंखों और फेफड़ों पर बुरा असर डालता है। बरसात के मौसम में समस्या और गंभीर हो जाती है क्योंकि गीली लकड़ियां आसानी से नहीं जलतीं। कई बार भोजन बनाने में घंटों लग जाते हैं और कई परिवारों को पर्याप्त भोजन भी नहीं मिल पाता। इसका सीधा असर महिलाओं के स्वास्थ्य बच्चों के पोषण और पूरे परिवार की दिनचर्या पर पड़ता है।
गांव के शिव कुमार ठाकुर बताते हैं कि उन्होंने कई बार उज्ज्वला योजना के लिए आवेदन किया लेकिन हर बार किसी न किसी दस्तावेज की कमी बताकर आवेदन रोक दिया गया। उन्हें यह भी स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी कि आखिर कौन सा दस्तावेज अधूरा है और उसे कैसे पूरा किया जाए। रोज कमाने और रोज खाने वाले परिवारों के लिए सरकारी दफ्तरों के बार-बार चक्कर लगाना भी आसान नहीं होता क्योंकि हर दिन की मजदूरी उनके परिवार की जरूरतों से जुड़ी होती है।
इसी तरह नीलम देवी का परिवार भी कई सरकारी योजनाओं से अनजान है। पांच बेटियों वाले इस परिवार की आय केवल मजदूरी पर निर्भर है। उन्हें केवल राशन कार्ड से मिलने वाली सुविधा की जानकारी है जबकि लड़कियों की शिक्षा और अन्य सरकारी योजनाओं के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। यह स्थिति बताती है कि केवल योजना शुरू कर देना पर्याप्त नहीं बल्कि उसकी जानकारी अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना भी उतना ही आवश्यक है।
75 वर्षीय रतिया देवी की कहानी भी ग्रामीण व्यवस्था की चुनौतियों को उजागर करती है। पति की मृत्यु के बाद वे अकेले रहकर मजदूरी कर जीवन यापन कर रही हैं। जरूरी दस्तावेज पूरे नहीं होने के कारण उन्हें वृद्धावस्था पेंशन का लाभ नहीं मिल पाया। उम्र के इस पड़ाव पर भी उन्हें मेहनत मजदूरी करनी पड़ रही है क्योंकि कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सरकारी प्रक्रिया पूरी कराने में उनकी मदद कर सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि योजनाओं की सफलता केवल बजट या घोषणाओं से तय नहीं होती बल्कि इस बात से तय होती है कि उनका लाभ कितनी आसानी से जरूरतमंद लोगों तक पहुंच रहा है। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान मजबूत किए जाएं दस्तावेज बनाने की प्रक्रिया सरल हो और स्थानीय स्तर पर सहायता केंद्र प्रभावी ढंग से काम करें तो लाखों परिवारों को उनका अधिकार मिल सकता है। सरकारी योजनाओं और आम नागरिक के बीच की यह दूरी कम करना ही समावेशी विकास की सबसे बड़ी आवश्यकता है।