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गैर-शैक्षणिक दायित्वों के बोझ तले शिक्षा व्यवस्था


– प्रो. एस.के. सिंह

किसी भी राष्ट्र की प्रगति और विकास का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। शिक्षा न केवल मनुष्यों के निर्माण का आधार है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक उन्नति का प्रतिबिंब भी होती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि शिक्षा राष्ट्र की आत्मा होती है। भारत की शिक्षा परंपरा सदियों तक विश्व के लिए प्रेरणा का स्रोत रही है।

तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे प्राचीन भारतीय शिक्षा केंद्र केवल ज्ञान के ही नहीं, बल्कि वैश्विक बौद्धिक विमर्श के भी प्रमुख केंद्र थे, जहाँ दुनिया के विभिन्न देशों से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे, क्योंकि भारतीय शिक्षा व्यवस्था ने हमेशा ज्ञान, नैतिकता, चरित्र-निर्माण तथा मानव एवं विश्व-कल्याण के आदर्शों को प्रतिष्ठित किया है, लेकिन मध्यकाल और विशेषकर औपनिवेशिक काल में भारतीय शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर गंभीर आघात पहुँचाया गया।

भारतीय ज्ञान-परंपरा को हानि पहुँचाने के लिए अनेक पारंपरिक शिक्षण संस्थानों को नष्ट किया गया। औपनिवेशिक शासन ने ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित की, जिसमें भारतीय भाषाओं एवं भारतीय ज्ञान-संपदा को कमतर आँकते हुए अंग्रेज़ी-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया। औपनिवेशिक काल में भारतीय ज्ञान-परंपरा, गुरुकुल व्यवस्था तथा स्वदेशी शिक्षण संस्थानों को जिस सुनियोजित तरीके से कमजोर किया गया, वैसा उदाहरण भारतीय इतिहास के अनेक पूर्ववर्ती कालखंडों में दिखाई नहीं देता।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात शिक्षा के विस्तार के लिए विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों की संख्या तो बढ़ी, विभिन्न आयोग भी गठित किए गए, लेकिन शिक्षा के भारतीयकरण, मातृभाषा में शिक्षण एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा के पुनर्स्थापन जैसे विषयों पर ठोस और व्यापक परिवर्तन लंबे समय तक दिखाई नहीं दिया। तत्कालीन सरकारें शिक्षा व्यवस्था में अपेक्षित बुनियादी परिवर्तन करने का साहस ही नहीं जुटा सकीं। परिणामस्वरूप, शिक्षा व्यवस्था काफी हद तक उसी ढाँचे में चलती रही, जिसकी नींव औपनिवेशिक काल में रखी गई थी।

ऐसे परिदृश्य में स्वतंत्रता के लगभग 73 वर्ष बाद, 2020 में एनईपी 2020 के माध्यम से देश को एक बेहद लचीली, समावेशी, बहुलतावादी, प्रगतिशील, छात्र-केंद्रित एवं भारतीयता से ओत-प्रोत शिक्षा नीति मिली, जिसमें भारतीय ज्ञान-परंपरा और मातृभाषा को केंद्र में रखते हुए छात्रों के सर्वांगीण विकास तथा उन्हें जीवन के लिए तैयार करने पर जोर दिया गया है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि स्वतंत्रता के बाद पहली बार किसी नीति में शिक्षा को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने की ठोस पहल की गई है। इसलिए इसे सही मायनों में स्वतंत्र भारत की पहली भारतीय शिक्षा नीति कहा जा सकता है। लेकिन शिक्षकों पर प्रशासनिक एवं गैर-शैक्षणिक कार्यों का बढ़ता बोझ राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन तथा उसके अपेक्षित परिणामों की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा नजर आ रहा है।

महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि सांदीपनि और आचार्य चाणक्य जैसे शिक्षकों की परंपरा इसलिए महान नहीं बनी कि वे प्रशासनिक औपचारिकताओं में दक्ष थे, बल्कि इसलिए बनी कि वे अपने शिष्यों के व्यक्तित्व-निर्माण में पूर्णतः समर्पित थे। उनके आश्रमों में शिक्षा का केंद्र-बिंदु गुरु और शिष्य का जीवंत संवाद था, लेकिन वर्तमान समय में शिक्षकों की गैर-शैक्षणिक कार्यों में बढ़ती व्यस्तता के कारण यह संवाद निरंतर कम होता जा रहा है, जिससे शिक्षण एवं शोध की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का खतरा मंडराने लगा है।

निरंतर रिपोर्टिंग, पोर्टल प्रबंधन, डेटा अपलोडिंग, निर्वाचन एवं जनगणना संबंधी कार्य, विभिन्न सरकारी सर्वेक्षण, छात्रवृत्ति योजनाओं का संचालन, आधार लिंकिंग, मध्यान्ह भोजन योजना का प्रबंधन, बार-बार माँगी जाने वाली सूचनाओं का संकलन, संस्थान स्तर पर विभिन्न समितियों का गठन एवं संचालन, विशिष्ट व्यक्तियों के कार्यक्रमों में व्यस्तता तथा अनेक गैर-शैक्षणिक दायित्वों के कारण शिक्षकों को अपने मूल दायित्व शिक्षण, अध्ययन एवं शोध के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है।

शिक्षक का कार्य केवल कक्षा में पढ़ाने तक सीमित नहीं होता; उसके अध्यापन की गुणवत्ता उसके सतत अध्ययन, चिंतन, मनन और आत्मविकास पर निर्भर करती है। इसलिए शिक्षक चौबीसों घंटे अपने दायित्वों का निर्वहन करता है। जो लोग यह मानते हैं कि शिक्षण कार्य समाप्त होते ही शिक्षक अपने दायित्वों से मुक्त होकर पूर्णतः स्वतंत्र हो जाता है, वे शिक्षक के वास्तविक उत्तरदायित्व, उसकी भूमिका की प्रकृति तथा शिक्षा की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया को भली-भाँति नहीं समझते और इसी भ्रांति के कारण शिक्षक पर गैर-शैक्षणिक दायित्वों का अनावश्यक बोझ लादने का समर्थन करते हैं।

मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसी अनेक नीतियाँ एवं योजनाएँ रही हैं, जिनकी मूल भावना अत्यंत श्रेष्ठ एवं पवित्र रही है, लेकिन उनकी सफलता और अपेक्षित परिणाम काफी हद तक उनके क्रियान्वयन पर निर्भर रहे हैं। देश में 2016 में लागू की गई नोटबंदी इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। नोटबंदी का निर्णय मूलतः काले धन, नकली मुद्रा तथा अवैध आर्थिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से उठाया गया एक दूरदर्शी और साहसिक कदम था।

नोटबंदी के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा को लेकर न तब कोई संदेह था और न आज है, लेकिन क्रियान्वयन के दौरान उत्पन्न हुई कुछ व्यावहारिक चुनौतियों एवं कठिनाइयों के कारण नोटबंदी से वे अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो सके, जिनकी आशा की गई थी। नोटबंदी नरेंद्र मोदी सरकार का ऐसा निर्णय था, जिसने वैश्विक स्तर पर यह धारणा स्थापित की कि भारत में ऐसा नेतृत्व उभर चुका है, जो केवल लोकप्रिय निर्णयों तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रहित में आवश्यक होने पर कठोर, अप्रिय और चुनौतीपूर्ण निर्णय लेने से भी नहीं हिचकेगा। नोटबंदी की सराहना नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री रिचर्ड थेलर ने भी की थी।

इसी प्रकार यदि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं होते हैं, तो इसका कारण नीति में कोई कमी होना नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की सबसे मजबूत कड़ी शिक्षक का उसके मूल कार्य से विमुख होना होगा। जिस प्रकार एक बेहतर एवं दूरगामी आर्थिक निर्णय, नोटबंदी, के क्रियान्वयन में त्रुटियाँ उसके प्रभाव को सीमित कर सकती हैं, उसी प्रकार एक उत्कृष्ट शिक्षा नीति भी तब तक अपने मूल उद्देश्यों को पूर्णतः प्राप्त नहीं कर सकती, जब तक शिक्षकों को अनावश्यक गैर-शैक्षणिक दायित्वों के बोझ से मुक्त न किया जाए।

अब तो ऐसा प्रतीत होने लगा है कि शिक्षा व्यवस्था में भी नौकरशाही की प्रवृत्तियाँ प्रवेश कर गई हैं, जहाँ शिक्षण की वास्तविक गुणवत्ता और परिणामों की अपेक्षा प्रक्रियाओं, अभिलेखीकरण तथा औपचारिकताओं को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि शिक्षकों पर लादे गए प्रशासनिक दायित्व तथा अधिकांश गैर-शैक्षणिक कार्य छात्रों के कल्याण और शिक्षा व्यवस्था के सुचारु संचालन से जुड़े होते हैं। इसलिए इन कार्यों के निष्पादन हेतु पृथक रूप से प्रशिक्षित कर्मियों की नियुक्ति की जानी चाहिए, जिससे शिक्षक अपना अधिकतम समय शोध एवं शिक्षण में दे सकें।

आजकल लगभग प्रत्येक गतिविधि के लिए फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी को अनिवार्य कर दिया गया है। अधिकांश कार्यक्रमों के प्रमाण के रूप में फोटो और वीडियो भेजने की बाध्यता ने शिक्षा व्यवस्था को एक प्रकार की औपचारिकता एवं दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया में उलझा दिया है। परिणामस्वरूप, कार्य की वास्तविक गुणवत्ता और उसके शैक्षिक प्रभाव की अपेक्षा उसके प्रमाण प्रस्तुत करने पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा है। कई बार ऑनलाइन कार्यक्रमों के लिए छात्रों को एक स्थान पर एकत्रित करने के निर्देश उनके नियमित अध्ययन में अनावश्यक व्यवधान उत्पन्न करते हैं।

यदि कोई कार्यक्रम ऑनलाइन माध्यम से आयोजित किया जा रहा है, तो छात्रों को उनकी सुविधा और उपलब्धता के अनुसार उसे देखने की स्वतंत्रता दी जा सकती है। इससे न केवल उनकी पढ़ाई प्रभावित होने से बचेगी, बल्कि ऑनलाइन माध्यम की वास्तविक उपयोगिता भी सुनिश्चित होगी। एनईपी 2020 के अनुच्छेद 5.12 में स्पष्ट उल्लेख है कि शिक्षकों का अधिकांश समय गैर-शैक्षणिक गतिविधियों में व्यतीत होने से रोकने के लिए उन्हें ऐसे कार्य करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, जो शिक्षा से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित न हों, लेकिन विडंबना यह है कि जिस देश ने शिक्षक को राष्ट्र-निर्माण का आधार माना, वहाँ आज शिक्षक अनेक प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक दायित्वों में उलझा हुआ है।

भारत की प्राचीन गुरुकुल परंपरा से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तक इस बात पर सभी सहमत हैं कि शिक्षा में वास्तविक और बुनियादी बदलाव केवल शिक्षकों के माध्यम से ही संभव है। यदि हमें एनईपी 2020 के वास्तविक लक्ष्यों तक पहुँचना है, तो हमें शिक्षक को गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ से मुक्त कर उसके वास्तविक दायित्व शिक्षण, शोध एवं अधिगम पर केंद्रित होने का अवसर देना होगा; अन्यथा एक उत्कृष्ट और दूरदर्शी शिक्षा नीति भी क्रियान्वयन की कमजोरियों के कारण अपने अपेक्षित परिणामों से वंचित रह सकती है।

(लेखक – जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर में वाणिज्य एवं व्यवसाय अध्ययनशाला में विभागाध्यक्ष हैं।)

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