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महिला की मर्जी सर्वोपरि, गर्भ रखना या गिराना उसका अधिकार; इंदौर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला


नई दिल्ली । मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कानून में निर्धारित समय सीमा के भीतर गर्भावस्था को जारी रखना है या समाप्त करना इसका अंतिम निर्णय महिला का होगा। अदालत ने कहा कि गर्भपात के लिए पति की सहमति आवश्यक नहीं है क्योंकि महिला की शारीरिक स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार हैं।

यह मामला इंदौर संभाग के एक विवाहित दंपती से जुड़ा है जिनकी शादी को करीब दो वर्ष हुए थे। वैवाहिक जीवन के दौरान दोनों के बीच लगातार विवाद बढ़ते गए और इसी दौरान महिला गर्भवती हो गई। जब गर्भावस्था लगभग 13 सप्ताह की थी तब दंपती अलग रहने लगे। महिला ने अदालत को बताया कि मौजूदा परिस्थितियों में वह गर्भ जारी नहीं रखना चाहती क्योंकि इससे उसके मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

महिला ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गर्भपात की अनुमति मांगी। याचिका में कहा गया कि पति के साथ वैवाहिक संबंध समाप्त करने का निर्णय लगभग तय हो चुका था लेकिन बाद में पति अपने रुख से पीछे हट गया। ऐसे में गर्भावस्था को जारी रखना उसके लिए मानसिक तनाव और भावनात्मक पीड़ा का कारण बन रहा है।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पति को नोटिस जारी किया था लेकिन वह न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ। राज्य सरकार की ओर से भी याचिका का विरोध नहीं किया गया। सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाया।

अपने आदेश में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले एक्स बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक महिला को अपनी शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने कहा कि अवांछित गर्भावस्था का मानसिक और शारीरिक प्रभाव सबसे अधिक महिला पर पड़ता है इसलिए अंतिम निर्णय भी उसी का होना चाहिए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला की गर्भावस्था मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971 में निर्धारित समय सीमा के भीतर थी। इसलिए अधिकृत चिकित्सक कानून के अनुसार गर्भसमापन की प्रक्रिया कर सकते हैं। न्यायालय ने यह भी माना कि पति पत्नी का अलग रहना वैवाहिक संबंधों में गंभीर विवाद या तलाक जैसी परिस्थितियां गर्भपात की अनुमति देने के लिए वैध आधार हो सकती हैं।

फैसले में अदालत ने कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। महिला की गरिमा मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोच्च प्राथमिकता है। साथ ही न्यायालय ने चिकित्सकों को निर्देश दिए कि गर्भपात की पूरी प्रक्रिया स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा निर्देशों और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप पूरी संवेदनशीलता और सावधानी के साथ की जाए।

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