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नाटो की एकजुटता पर उठे सवाल, अंकारा बैठक से पहले रक्षा बजट, अमेरिकी रणनीति और यूरोपीय असहमति बनी बड़ी परीक्षा

नई दिल्ली । अंकारा में इस सप्ताह होने जा रहे नाटो शिखर सम्मेलन से पहले संगठन के भीतर बढ़ते मतभेद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों के बीच गठबंधन जहां एकजुटता का संदेश देने की तैयारी कर रहा है, वहीं रक्षा खर्च, पश्चिम एशिया की स्थिति और भविष्य की रणनीतिक दिशा जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के अलग-अलग रुख ने उसकी एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सम्मेलन ऐसे समय आयोजित हो रहा है जब हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रम ने सहयोगी देशों के बीच दृष्टिकोण का अंतर स्पष्ट कर दिया है। कई यूरोपीय देशों ने कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका के उद्देश्य का समर्थन किया, लेकिन किसी भी सैन्य अभियान में प्रत्यक्ष भागीदारी से दूरी बनाए रखी। इससे यह संकेत मिला कि सुरक्षा संबंधी मामलों में सभी सदस्य समान रणनीति अपनाने के पक्ष में नहीं हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि यूरोपीय देशों की प्राथमिकताएं अमेरिका से अलग हैं। उनके लिए क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा और संभावित शरणार्थी संकट जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचना उनकी रणनीतिक आवश्यकता माना जा रहा है। इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे संघर्षों के अनुभवों ने भी कई यूरोपीय सरकारों को सैन्य अभियानों को लेकर अधिक सतर्क बना दिया है।

सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण विषय रक्षा बजट बढ़ाने की योजना रहने की संभावना है। सदस्य देशों ने पहले 2035 तक रक्षा खर्च को सकल घरेलू उत्पाद के पांच प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य स्वीकार किया था। हालांकि इस लक्ष्य को लागू करना कई देशों के लिए आसान नहीं माना जा रहा है। आर्थिक सुस्ती, बढ़ता सार्वजनिक कर्ज और सामाजिक कल्याण पर बढ़ते खर्च के कारण अनेक सरकारों के सामने संसाधनों का संतुलन बड़ी चुनौती बन सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कई यूरोपीय देशों में मतदाता स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी प्राथमिकताओं को रक्षा बजट से अधिक महत्व देते हैं। ऐसे में सरकारों के लिए सैन्य खर्च में बड़े स्तर की वृद्धि को राजनीतिक समर्थन दिलाना कठिन हो सकता है। यही कारण है कि लक्ष्य तय होने के बावजूद उसके क्रियान्वयन को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

नाटो की रणनीतिक दिशा को लेकर भी बहस तेज होती जा रही है। अमेरिका लंबे समय से यूरोपीय देशों से अपनी सुरक्षा व्यवस्था में अधिक वित्तीय और सैन्य योगदान की अपेक्षा करता रहा है। इसके पीछे उद्देश्य यह माना जा रहा है कि यूरोप अपनी पारंपरिक रक्षा जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा स्वयं संभाले, जबकि अमेरिका अपनी प्राथमिकताओं को अन्य क्षेत्रों की ओर केंद्रित कर सके।

सम्मेलन से पहले तुर्किए के कई शहरों में नाटो विरोधी प्रदर्शन भी देखने को मिले। प्रदर्शनकारियों ने रक्षा खर्च बढ़ाने के बजाय सार्वजनिक सेवाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक निवेश की मांग की। उनका कहना है कि बढ़ते सैन्य बजट का असर सामाजिक कल्याण योजनाओं पर पड़ सकता है। इसी प्रकार के विरोध प्रदर्शन हाल के वर्षों में यूरोप के अन्य देशों में भी सामने आए हैं।

विश्लेषकों का यह भी मानना है कि सम्मेलन के दौरान रक्षा खरीद से जुड़े कई महत्वपूर्ण समझौतों पर चर्चा हो सकती है। इससे सदस्य देशों की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने का प्रयास होगा, लेकिन साथ ही यह बहस भी जारी रहेगी कि गठबंधन की भविष्य की रणनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी। ऐसे में अंकारा शिखर सम्मेलन केवल सुरक्षा सहयोग का मंच नहीं, बल्कि नाटो की आंतरिक एकजुटता और दीर्घकालिक भविष्य की भी अहम परीक्षा माना जा रहा है।

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