फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित है। इसमें पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और अवैध हत्याओं से जुड़े मामलों को दर्शाया गया है। इसी कारण फिल्म के अचानक हटने के बाद यह मामला केवल मनोरंजन जगत तक सीमित न रहकर राजनीतिक मुद्दा बन गया है।
पंजाब के विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस निर्णय पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल सहित कई दलों के नेताओं ने अलग-अलग बयान जारी कर फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने की मांग की है। उनका कहना है कि ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित किसी रचना को सार्वजनिक विमर्श से हटाना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
कांग्रेस नेता सुखपाल सिंह खैरा ने कहा कि फिल्म में जिन घटनाओं का उल्लेख किया गया है, उनसे जुड़े कई मामलों पर न्यायिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। उनके अनुसार इस प्रकार की फिल्म को हटाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने केंद्र सरकार से फिल्म को पुनः उपलब्ध कराने की मांग की।
शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भी इस कदम पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इतिहास से जुड़े संवेदनशील विषयों पर खुली चर्चा लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अकाली दल के वरिष्ठ नेता दलजीत सिंह चीमा ने भी कहा कि फिल्म एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के जीवन पर आधारित है और इस मामले पर संबंधित पक्षों को स्पष्ट स्थिति सामने रखनी चाहिए।
आम आदमी पार्टी के नेताओं ने भी फिल्म हटाने के निर्णय पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि कला और रचनात्मक अभिव्यक्ति को स्वतंत्र वातावरण मिलना चाहिए तथा ऐसे मामलों में पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है। वहीं शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रतिनिधियों ने भी ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फिल्मों को सार्वजनिक चर्चा का माध्यम बताते हुए प्रतिबंध के बजाय संवाद की आवश्यकता पर बल दिया।
इस विवाद पर कानूनी क्षेत्र से भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। जसवंत सिंह खालड़ा से जुड़े मामलों में कार्य कर चुके कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा कि फिल्म में प्रस्तुत कई घटनाएं न्यायिक और जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड का हिस्सा रही हैं। उनके अनुसार किसी फिल्म को हटाने से इतिहास से जुड़े प्रश्न समाप्त नहीं होते, बल्कि सार्वजनिक बहस और अधिक तेज हो सकती है।
दूसरी ओर कुछ पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों ने कानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से भी इस विषय को देखने की जरूरत बताई है। उनका मानना है कि संवेदनशील विषयों पर आधारित सामग्री के प्रसारण के दौरान सामाजिक शांति और सार्वजनिक व्यवस्था को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ऐसे विषयों पर तथ्यात्मक चर्चा लोकतांत्रिक समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
फिल्म की रिलीज से पहले भी इसे लंबी सेंसर प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। बताया जाता है कि शुरुआती चरण में फिल्म के शीर्षक और सामग्री को लेकर कई स्तरों पर विचार-विमर्श हुआ था। बाद में संशोधित शीर्षक के साथ इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जारी किया गया, लेकिन कुछ ही समय बाद भारत में इसकी उपलब्धता समाप्त हो गई, जिससे विवाद और गहरा गया।
फिल्म हटाए जाने के बाद दिलजीत दोसांझ ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व और उनके संघर्ष से जुड़े विचारों को दबाया नहीं जा सकता। इस पूरे घटनाक्रम के बाद ‘सतलुज’ एक फिल्म से आगे बढ़कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ऐतिहासिक विमर्श और सार्वजनिक संवाद से जुड़ा महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है।