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गर्भवती IPS अधिकारियों के प्रशिक्षण पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई, 1993 के नियम की वैधता और समानता के अधिकार पर उठे बड़े सवाल

नई दिल्ली । गर्भवती महिला आईपीएस अधिकारियों के प्रशिक्षण से जुड़े तीन दशक पुराने नियम की वैधता अब सुप्रीम कोर्ट की कसौटी पर है। वर्ष 1993 में जारी गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन को चुनौती देने वाली याचिका पर शीर्ष अदालत सुनवाई कर रही है। इस मामले ने महिला अधिकारियों के अधिकार, सेवा नियमों में समानता और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुरूप प्रशासनिक नीतियों की आवश्यकता पर नई बहस छेड़ दी है।

याचिका मध्य प्रदेश कैडर की वर्ष 2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर ने दायर की है। उनका कहना है कि केवल गर्भावस्था के आधार पर प्रशिक्षण रोकना वर्तमान समय की चिकित्सा समझ और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। उनका तर्क है कि प्रत्येक अधिकारी की शारीरिक स्थिति और मेडिकल फिटनेस का अलग-अलग आकलन किया जाना चाहिए, न कि सभी मामलों में एक समान प्रतिबंध लागू किया जाए।

उर्वशी सेंगर ने नवंबर 2023 में अपने प्रशिक्षण का पहला चरण पूरा किया था। दूसरे चरण के प्रशिक्षण के दौरान वह गर्भवती हुईं और इसकी जानकारी संबंधित पुलिस अकादमी को दी। इसके बाद उन्हें प्रशिक्षण बीच में ही रोकने तथा प्रसव के एक वर्ष बाद अगली बैच के साथ दोबारा प्रशिक्षण पूरा करने का निर्देश दिया गया। बच्चे के जन्म के बाद उन्होंने मेडिकल फिटनेस के आधार पर प्रशिक्षण में दोबारा शामिल होने की अनुमति मांगी, लेकिन वर्ष 1993 के नियम का हवाला देते हुए उनकी मांग स्वीकार नहीं की गई।

इसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का रुख किया। ट्रिब्यूनल ने अंतरिम आदेश में आवश्यक चिकित्सकीय औपचारिकताएं पूरी करने की शर्त पर उन्हें प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी थी। हालांकि बाद में संबंधित पुलिस अकादमी ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश पर रोक लगाते हुए कहा कि संबंधित नियम महिला अधिकारी और उसके होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाया गया था।

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंच गया है, जहां अदालत को यह तय करना है कि क्या केवल गर्भावस्था किसी महिला अधिकारी को प्रशिक्षण से बाहर रखने का पर्याप्त आधार हो सकती है। याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रशिक्षण के दूसरे चरण में मुख्य रूप से कक्षा आधारित अध्ययन, अकादमिक मॉड्यूल और संस्थागत गतिविधियां शामिल होती हैं, जिनमें अत्यधिक शारीरिक श्रम की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे में बिना व्यक्तिगत मेडिकल मूल्यांकन के प्रशिक्षण से वंचित करना उचित नहीं माना जा सकता।

याचिका में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी उठाया गया है कि वर्ष 2004 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने महिला आईएएस अधिकारियों के लिए पुराने नियमों में संशोधन किया था। संशोधित व्यवस्था के तहत महिला आईएएस प्रोबेशनरों को उनकी व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर प्रशिक्षण पूरा करने की अनुमति दी जाती है। ऐसे में आईपीएस अधिकारियों के लिए अब भी 1993 के पुराने प्रावधान लागू रखना समानता के सिद्धांत के विपरीत बताया गया है।

वर्ष 1993 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार यदि कोई महिला आईपीएस प्रोबेशनर प्रशिक्षण के दौरान गर्भवती हो जाती है तो उसका प्रशिक्षण तत्काल रोक दिया जाता है और प्रसव के एक वर्ष बाद ही उसे दोबारा प्रशिक्षण पूरा करने की अनुमति मिलती है। इस अवधि को असाधारण अवकाश माना जाता है, हालांकि इससे उसकी वरिष्ठता प्रभावित नहीं होती।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में महिला आईपीएस अधिकारियों के प्रशिक्षण, सेवा नियमों और मातृत्व से जुड़े प्रशासनिक प्रावधानों की दिशा भी तय कर सकता है। अदालत का फैसला यह स्पष्ट करेगा कि वर्तमान परिस्थितियों में पुराने सेवा नियमों को आधुनिक चिकित्सा मानकों और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप किस प्रकार देखा जाना चाहिए।

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