साक्षात्कार जिसने मचाया बवाल
यह विवाद तब शुरू हुआ जब माइक हकाबी प्रसिद्ध रूढ़िवादी टिप्पणीकार टकर कार्लसन के साथ एक साक्षात्कार में शामिल हुए। बातचीत के दौरान जब कार्लसन ने ‘बाइबिल’ के संदर्भों का हवाला देते हुए पूछा कि क्या अब्राहम के वंशजों (इजरायल) को वह पूरी भूमि मिलनी चाहिए जो आज के लगभग पूरे पश्चिम एशिया को कवर करती है, तो हकाबी ने जवाब दिया, “अगर वे सब कुछ ले लें तो भी ठीक होगा।” हालांकि, उन्होंने बाद में संतुलित करते हुए यह भी कहा कि इजरायल फिलहाल अपने क्षेत्र का विस्तार नहीं कर रहा है, बल्कि केवल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है।
सऊदी और पाकिस्तान की तीखी प्रतिक्रिया
सऊदी अरब ने हकाबी के इस बयान को ‘कट्टरपंथी’ करार देते हुए पूरी तरह से अस्वीकार्य बताया है। वहीं, मिस्र ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का स्पष्ट उल्लंघन बताया। रविवार को इस विरोध की लहर में पाकिस्तान भी शामिल हो गया। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने एक संयुक्त बयान जारी करते हुए कहा कि ओमान, कुवैत, कतर, तुर्किये और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ मिलकर वे इस टिप्पणी की ‘कड़ी निंदा’ करते हैं।
संयुक्त बयान में विशेष रूप से उल्लेख किया गया कि हकाबी की यह सोच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस घोषित दृष्टिकोण के विपरीत है, जो गाजा संघर्ष को समाप्त करने और एक स्वतंत्र फलस्तीनी राष्ट्र के निर्माण (Two-State Solution) की वकालत करता है।
दो-राष्ट्र समाधान के धुर विरोधी हैं हकाबी
माइक हकाबी का रिकॉर्ड हमेशा से इजरायल के पक्ष में बेहद झुका हुआ रहा है। वे लंबे समय से फलस्तीनी राष्ट्र के विचार का विरोध करते रहे हैं। पिछले वर्ष उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि वे ब्रिटिश शासन के दौरान रहने वाले अरब वंशजों को ‘फलस्तीनी’ कहने में विश्वास नहीं रखते। उनकी यह वैचारिक पृष्ठभूमि अब अरब देशों के बीच अमेरिका की मध्यस्थता की भूमिका पर सवाल खड़े कर रही है।
इतिहास और वर्तमान का संघर्ष
1967 के ‘छह दिवसीय युद्ध’ के बाद से ही वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गोलान हाइट्स पर इजरायल के कब्जे को लेकर विवाद बना हुआ है। हाल के वर्षों में इजरायल ने वेस्ट बैंक में बस्तियों का तेजी से विस्तार किया है, जिसे लेकर फलस्तीनी लोग और अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार चिंता जताते रहे हैं। हकाबी का यह नया बयान उन जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है, जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव और अधिक बढ़ने की आशंका है।