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डॉक्टरों की एक 'गलत' सूचना ने ले ली मासूम की जान 12वीं की छात्रा की मौत, परिजनों का आरोप- प्रेग्नेंसी बोलकर बेटी को डिप्रेशन में धकेला


भोपाल। राजधानी भोपाल में 17 वर्षीय एक स्कूली छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था और डॉक्टरों की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। परिजनों का आरोप है कि डॉक्टरों ने पहले उनकी बेटी को ‘प्रेग्नेंट’ बताया, जिससे वह गहरे सदमे (डिप्रेशन) में चली गई और अंततः इलाज के दौरान उसकी सांसें टूट गईं। जबकि बाद में उसी छात्रा को ‘ट्यूमर’ से पीड़ित बताया गया।
घटनाक्रम: परीक्षा के बाद बिगड़ी तबीयत और ‘गलत’ रिपोर्ट का सदमा
मृतक छात्रा प्राइवेट स्कूल से 12वीं की पढ़ाई कर रही थी। 2 मार्च 2026 को वह अपनी बोर्ड परीक्षा देकर घर लौटी थी, जिसके बाद अचानक उसकी तबीयत खराब हो गई।
पिता के अनुसार, बेटी को सबसे पहले हमीदिया अस्पताल ले जाया गया। आरोप है कि वहां के डॉक्टरों ने उसे 2 माह की प्रेग्नेंट बता दिया।जब सोनोग्राफी में स्थिति स्पष्ट नहीं हुई, तो उसे सुल्तानिया अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास भेजा गया। वहां हुई जांच में सामने आया कि छात्रा को प्रेग्नेंसी नहीं, बल्कि पेट में ट्यूमर है।

डिप्रेशन और मौत: “बेटी ने बोलना बंद कर दिया था”
परिजनों का सबसे गंभीर आरोप यह है कि ‘प्रेग्नेंसी’ की खबर सुनते ही छात्रा मानसिक रूप से पूरी तरह टूट गई थी।एक मासूम छात्रा के लिए डॉक्टरों द्वारा कही गई यह बात सामाजिक और व्यक्तिगत तौर पर इतनी बड़ी थी कि उसने लोगों से बात करना और कुछ भी बोलना बंद कर दिया। परिजनों का कहना है कि अस्पताल की सूचना पर पुलिस ने भी इसे ‘रेप केस’ मानकर जांच शुरू कर दी थी, जिससे परिवार और छात्रा पर दबाव और बढ़ गया।लगातार गिरती मानसिक और शारीरिक स्थिति के बीच सोमवार सुबह इलाज के दौरान छात्रा की मौत हो गई।

पुलिस का पक्ष: ट्यूमर से मौत की पुष्टि
मामले की जांच कर रही एमपी नगर थाने की एसआई अर्चना तिवारी के अनुसार, डॉक्टरों की प्रारंभिक रिपोर्ट में छात्रा का इलाज ट्यूमर के लिए चलना बताया गया है।रिपोर्ट में प्रेग्नेंसी जैसी कोई बात सामने नहीं आई है। हालांकि, परिजनों के आरोपों को देखते हुए मामले में मर्ग कायम कर लिया गया है।अब पुलिस को पोस्टमार्टम (PM) रिपोर्ट का इंतजार है। इसके बाद ही यह साफ हो पाएगा कि मौत की असली वजह ट्यूमर थी या गलत निदान से उपजा मानसिक तनाव।

यह मामला केवल एक बीमारी का नहीं, बल्कि शब्दों की संवेदनशीलता का है। अगर परिजनों के आरोप सही हैं, तो यह डॉक्टरों की बड़ी लापरवाही है कि एक गंभीर रूप से बीमार छात्रा को गलत सूचना देकर मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित किया गया कि वह जिंदगी की जंग हार गई।”

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