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ईरान की धरती पर नहीं उतरेंगे अमेरिकी सैनिक? जानिए वजह


वाशिंगटन। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर शुरू किए गए व्यापक हवाई हमलों के बाद मध्य पूर्व में युद्ध भड़क गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य ईरानी जनता के लिए ‘आजादी’ बताया है। आसमान से बरसती मिसाइलों और भयानक बमबारी के बीच ट्रंप का ‘एंडगेम’ यानी अंतिम लक्ष्य बिल्कुल साफ हो चुका है- ईरान में पूरी तरह से सत्ता परिवर्तन। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के असली लक्ष्य को हासिल करना- बिना जमीनी सेना के लगभग असंभव है।

इस संघर्ष ने अपने शुरुआती दिनों में ही पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है। शनिवार तड़के हुए अमेरिकी-इजरायली हवाई हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई, कई शीर्ष अधिकारी और सैकड़ों नागरिक मारे गए हैं। इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी देशों, अमेरिकी ठिकानों और इजरायल पर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए हैं। इराक स्थित ईरान-समर्थित गुटों और लेबनान के हिज्बुल्लाह ने भी युद्ध में प्रवेश कर लिया है। इसके साथ ही इजरायल द्वारा दक्षिणी लेबनान पर जमीनी हमले की योजना की भी खबरें हैं।
क्या केवल हवाई हमलों से सत्ता परिवर्तन संभव है?

राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी जनता से अपील करते हुए कहा है- जब हम अपना काम खत्म कर लेंगे, तो अपनी सरकार पर कब्ब्जा कर लेना। यह आपकी होगी। हालांकि, विशेषज्ञ इस रणनीति पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

अल-जजीरा से बात करते हुए स्टिम्सन सेंटर थिंक टैंक के केली ग्रीको ने कहा कि जमीनी सेना के बिना इतना बड़ा राजनीतिक बदलाव लाना लगभग असंभव है। उन्होंने चेतावनी दी कि ट्रंप हवाई हमलों की ताकत को लेकर कुछ ज्यादा ही मुग्ध हो गए हैं। सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिसी के मैथ्यू डस ने स्पष्ट किया कि इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहां केवल हवाई हमलों से सत्ता परिवर्तन हुआ हो। उन्होंने 2011 के लीबिया युद्ध का उदाहरण दिया, जहां नाटो के हवाई हमलों के बावजूद मुअम्मर गद्दाफी को हटाने के लिए जमीनी स्तर पर विद्रोहियों को ही लड़ना पड़ा था।
हालिया रॉयटर्स सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 25% अमेरिकी इस युद्ध का समर्थन कर रहे हैं। इसकी तुलना में 2003 के इराक युद्ध को शुरुआत में लगभग 55% जनसमर्थन प्राप्त था। डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंटल ने एक खुफिया ब्रीफिंग के बाद चिंता व्यक्त की है कि अमेरिका ईरान में जमीनी सेना उतारने की दिशा में बढ़ रहा है, जिससे अमेरिकी सैनिकों के लिए खतरा बहुत अधिक बढ़ जाएगा।
ट्रंप का ‘मास्टरप्लान’: हवा और समंदर से तबाही

ट्रंप प्रशासन की रणनीति इराक या अफगानिस्तान जैसी नहीं है, जहां लाखों सैनिक भेजकर कब्ज़ा किया गया था। ट्रंप का दांव है कि आसमान और समंदर से ही इतना भयानक प्रहार किया जाए कि ईरान का पूरा सिस्टम ताश के पत्तों की तरह ढह जाए। इस रणनीति का सबसे बड़ा उदाहरण ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की मौत है।

ट्रंप का मानना है कि नेतृत्व को खत्म करने से व्यवस्था अपने आप पंगु हो जाएगी। अमेरिका ईरान की मिसाइल क्षमता, उसकी नेवी और उसके परमाणु ठिकानों को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर रहा है ताकि ईरान के पास पलटवार की कोई ताकत ही न बचे।
‘बूट्स ऑन द ग्राउंड’ से परहेज क्यों?

ट्रंप हमेशा से अमेरिका को दूसरे देशों के ‘अंतहीन युद्धों’ में फंसाने के खिलाफ रहे हैं। किसी देश में पैदल सेना भेजने का मतलब है अमेरिकी सैनिकों की लाशें वापस आना और खरबों डॉलर का खर्च। ट्रंप का ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा इसके सख्त खिलाफ है।

ट्रंप खुलेआम ईरानी जनता से कह रहे हैं कि वे इस मौके का फायदा उठाएं और खुद अपनी सरकार को उखाड़ फेंकें। ट्रंप को उम्मीद है कि भारी बमबारी और बदहाली से टूटकर ईरानी जनता खुद बगावत कर देगी और अमेरिका को सेना उतारने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
ट्रंप प्रशासन के भीतर और बाहर अलग-अलग सुर

इस युद्ध के उद्देश्यों को लेकर अमेरिकी नेताओं और प्रशासन के बयानों में काफी विरोधाभास देखने को मिल रहा है। विदेश मंत्री मार्क रूबियो ने कहा कि लक्ष्य ईरान के परमाणु और ड्रोन कार्यक्रमों तथा नौसेना को नष्ट करना है ताकि वह विदेशी हमलों से न बच सके।

वहीं रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि यह कोई अंतहीन युद्ध नहीं होगा; हम स्पष्ट उद्देश्यों के साथ काम कर रहे हैं। डेमोक्रेटिक सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन ने कहा, ‘यह एक अवैध युद्ध है जो झूठ पर आधारित है। ट्रंप प्रशासन के पास ईरान को लेकर कोई स्पष्ट योजना नहीं है।’

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने इस युद्ध की आवश्यकता और इसके सटीक लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से जनता के सामने नहीं रखा है। यह संघर्ष अब उस त्वरित सैन्य कार्रवाई से कहीं अधिक लंबा खिंचता दिख रहा है, जिसके लिए ट्रंप जाने जाते हैं, जैसे जनवरी में वेनेज़ुएला के निकोलस मादुरो का अपहरण या जून में ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले।

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