Mahakaushal Times

क्या डिजिटल राजनैतिक प्रचार की कोई नैतिक सीमा है?


– डॉ. शैलेश शुक्ला

राजनीतिक प्रचार उतना ही पुराना है जितनी कि राजनीति स्वयं। प्राचीन रोम में दीवारों पर संदेश लिखे जाते थे। मध्यकाल में राजा अपनी शक्ति का प्रदर्शन भव्य स्मारकों और अनुष्ठानों के माध्यम से करते थे। बीसवीं सदी में रेडियो, टेलीविज़न और समाचार पत्र राजनीतिक प्रचार के मुख्य माध्यम बने। लेकिन इन सभी युगों में एक बात साझी थी — प्रचार की एक सार्वजनिक दृश्यता और उसके साथ एक निहित जवाबदेही। आज, डिजिटल राजनीतिक प्रचार ने इस जवाबदेही की अवधारणा को ही उलट दिया है। जब प्रचार अदृश्य हो, व्यक्तिगत हो, तात्कालिक हो, और किसी भी तथ्यात्मक जाँच से मुक्त हो — तो प्रश्न उठता है कि क्या इसकी कोई नैतिक सीमा है? और यदि है, तो उसे कौन तय करेगा और कौन लागू करेगा?

नैतिकता के प्रश्न पर विचार करने से पहले यह स्वीकार करना आवश्यक है कि राजनीतिक प्रचार और राजनीतिक संवाद के बीच की रेखा स्पष्ट नहीं है। हर राजनेता अपने विचारों को श्रेष्ठ और विरोधी के विचारों को निकृष्ट प्रस्तुत करता है — यह राजनीति का स्वाभाविक अंग है। नैतिक समस्या तब शुरू होती है जब प्रचार झूठ पर आधारित हो, जब वह लोगों को हेरफेर करे बजाय सूचित करने के, और जब वह समाज में नफरत, विभाजन, या हिंसा को बढ़ावा दे।

डिजिटल राजनीतिक प्रचार की नैतिक समस्याओं की पहली श्रेणी है — असत्य और भ्रामक जानकारी का जानबूझकर प्रसार। जब कोई राजनीतिक दल या उसका समर्थक यह जानते हुए कि कोई बात असत्य है, उसे सोशल मीडिया पर फैलाता है ताकि मतदाताओं की राय को प्रभावित किया जा सके — यह नैतिक दृष्टि से स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य है। एमआईटी के 2018 के अध्ययन ने प्रमाणित किया कि असत्य सूचनाएँ ट्विटर पर 70 प्रतिशत अधिक रीट्वीट होती हैं। यह लोकतंत्र की उस बुनियाद पर सीधा हमला है जिसके अनुसार नागरिक सही जानकारी के आधार पर अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करें।

दूसरी नैतिक समस्या है व्यक्तिगत डेटा का बिना सहमति के राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग। ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ प्रकरण इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। इस कंपनी ने करीब 87 मिलियन फेसबुक उपयोगकर्ताओं के डेटा का उपयोग करके लोगों के मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाए और उनकी कमज़ोरियों को लक्षित करने वाले राजनीतिक विज्ञापन दिखाए। यह केवल गोपनीयता का उल्लंघन नहीं था — यह मानवीय स्वायत्तता और स्वतंत्र इच्छा पर हमला था। जब एक प्रणाली यह तय करने लगती है कि आपके मन में कौन सा डर है और फिर उसी डर को और गहरा करने वाला राजनीतिक संदेश आप तक पहुँचाती है, तो आपकी ‘स्वतंत्र पसंद’ वास्तव में कितनी स्वतंत्र है?

तीसरी नैतिक समस्या है सांप्रदायिक या जातीय विद्वेष को भड़काने के लिए डिजिटल प्रचार का उपयोग। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध 2017 में हुई हिंसा में फेसबुक की भूमिका को संयुक्त राष्ट्र की तथ्य-अन्वेषण टीम ने अपनी 2018 की रिपोर्ट में ‘निर्णायक’ बताया। 700,000 से अधिक रोहिंग्या को बांग्लादेश भागना पड़ा। 2022 में एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक विस्तृत रिपोर्ट ने भी पुष्टि की कि मेटा के एल्गोरिदम ने रोहिंग्या-विरोधी नफरत भरी सामग्री को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया। यह एक चरम उदाहरण है, लेकिन यह दर्शाता है कि डिजिटल राजनीतिक प्रचार में ‘नफरत’ एक हथियार बन सकती है जिसके परिणाम जीवन और मृत्यु की रेखा तक पहुँच सकते हैं।

नैतिक सीमाओं के प्रश्न पर तीन मुख्य दृष्टिकोण हैं। पहला ‘बाज़ार-आधारित’ दृष्टिकोण यह मानता है कि सूचना के मुक्त बाज़ार में अच्छे विचार बुरे विचारों को हरा देंगे। दूसरा ‘सरकार-नियंत्रण’ का दृष्टिकोण मानता है कि सरकार को स्पष्ट नियम बनाने चाहिए। तीसरा ‘मंच-उत्तरदायित्व’ का दृष्टिकोण मानता है कि डिजिटल मंचों को स्वयं अपने नैतिक मानक तय करने और लागू करने चाहिए। इन तीनों दृष्टिकोणों की अपनी-अपनी सीमाएँ और जोखिम हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अत्यधिक नियंत्रण सत्ताधारी दलों को विपक्षी आवाज़ों को दबाने का अवसर दे सकता है — यह जोखिम भारत जैसे देश में विशेष रूप से प्रासंगिक है।

‘माइक्रोटार्गेटिंग’ की नैतिकता पर विशेष विचार आवश्यक है। ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ के पूर्व सीईओ अलेक्जेंडर निक्स ने 2016 में एक साक्षात्कार में बताया था कि उनकी कंपनी के पास अमेरिका के 230 मिलियन वयस्कों पर 4,000 से 5,000 ‘डेटा पॉइंट’ थे और वे हर व्यक्ति का व्यक्तित्व प्रोफाइल बनाते थे। यदि इस डेटा का उपयोग केवल लोगों को उनकी पहचानी गई कमज़ोरियों पर प्रहार करके एक निश्चित तरीके से वोट देने के लिए प्रेरित करने में किया जाए, तो यह सूचना नहीं, मनोवैज्ञानिक हेरफेर है — जो नैतिक दृष्टि से अस्वीकार्य है।

डिजिटल मंचों की नैतिक ज़िम्मेदारी भी इस प्रश्न का एक केंद्रीय हिस्सा है। फेसबुक की पूर्व कर्मचारी फ्रांसेस हाउजेन ने अपनी सीनेट गवाही में कहा था, “फेसबुक ने बार-बार अपने मुनाफे और लोगों की सुरक्षा के बीच टकराव में मुनाफे को चुना। परिणाम एक ऐसी प्रणाली है जो विभाजन, उग्रवाद और ध्रुवीकरण को बढ़ाती है।” जब ये कंपनियाँ राजनीतिक विज्ञापनों से अरबों डॉलर कमाती हैं, तो उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। ‘तटस्थ मंच’ का तर्क खोखला है — जब कोई मंच अपने एल्गोरिदम के माध्यम से तय करता है कि कौन सी सामग्री करोड़ों लोगों तक पहुँचेगी, तो वह संपादकीय निर्णय ले रहा है।

नागरिक समाज और पत्रकारिता की भूमिका भी नैतिक सीमाओं को परिभाषित और लागू करने में महत्वपूर्ण है। स्वतंत्र तथ्य-परीक्षण संस्थाएँ, निगरानी समूह, और खोजी पत्रकार डिजिटल प्रचार के दुरुपयोग को उजागर करने में अपरिहार्य भूमिका निभाते हैं। भारत में ऑल्ट न्यूज़, बूम, और अन्य संस्थाएँ यह काम करती हैं। यूरोपीय संघ के ‘कोड ऑफ प्रैक्टिस ऑन डिसइन्फर्मेशन’ और यूनेस्को की ‘इंटरनेट यूनिवर्सलिटी इंडिकेटर्स’ जैसे दस्तावेज़ नैतिक सिद्धांतों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति को रेखांकित करते हैं — जैसे पारदर्शिता, सत्यता, और नफरत की अपील के लिए कोई स्थान नहीं।

अंतिम और शायद सबसे महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न यह है — क्या राजनीतिक दलों में स्वयं नैतिक प्रचार का संकल्प होना चाहिए? कानून और नियामक संस्थाएँ अपना काम करें लेकिन अंततः एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि राजनेता स्वयं यह तय करें कि वे क्या करेंगे और क्या नहीं — केवल इसलिए नहीं कि कानून मना करता है, बल्कि इसलिए कि यह सही है। डिजिटल राजनीतिक प्रचार की कोई भी नैतिक सीमा तब तक प्रभावी नहीं होगी जब तक कि राजनीतिक नेता, दल, और उनके समर्थक यह न समझें कि झूठ, नफरत, और हेरफेर से चुनाव जीतना भले ही एक पार्टी के लिए लाभदायक हो, लेकिन यह उस लोकतंत्र को नष्ट करता है जिसकी बुनियाद पर उनकी अपनी सत्ता भी टिकी है।

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