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पानी से डरने वाली लड़की बनी गोल्ड मेडलिस्ट, Nisha Millet की प्रेरणादायक कहानी


नई दिल्ली। निशा मिलेट का नाम भारतीय तैराकी इतिहास में एक प्रेरणा के रूप में लिया जाता है। यह कहानी सिर्फ मेडल जीतने की नहीं, बल्कि अपने सबसे बड़े डर को हराकर उसे ताकत में बदलने की है। जिस लड़की को बचपन में पानी से डर लगता था, उसी ने आगे बढ़ते देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड मेडल दिलाया।

जब पानी से था गहरा डर

निशा मिलेट का जन्म 20 मार्च 1982 को बेंगलुरु में हुआ। बचपन में उनका पानी से डर इतना गहरा था कि 5 साल की उम्र में वह डूबते-डूबते नियतं। यह घटना उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गई। उनके पिता ने फैसला किया कि डर से दौड़ने के बजाय उनका सामना करना चाहिए, और दब से तैराकी की शुरुआत हुई।

डर को हराकर जुनून बनाया

1991 में चेन्नई के शेनॉय नगर क्लब में उन्होंने तैराकी सीखनी शुरू की। शुरुआत में यह सिर्फ डर दूर करने का जरिया था, लेकिन धीरे-धीरे यही उनका जुनून बन गया। कड़ी मेहनत और अनुशासन ने उन्हें जल्द ही एक उभरती हुई तैराकी बना दिया।

छोटी उम्र में बड़ी उपलब्धियां

सिर्फ एक साल के अंदर ही 1992 में निशा ने 50 मीटर फ्रीस्टाइल में अपना पहला स्टेट मेडल जीता। 1994 में, जब वह सब-जूनियर थीं, तब उन्होंने सीनियर नेशनल में पांचों फ्रीस्टाइल इवेंट में गोल्ड मेडल जीते। इसी साल उन्होंने हांगकांग में एशियन एज ग्रुप चैंपियनशिप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहला मेडल हासिल किया।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन

निशा मिलेट ने एशियन गेम्स 1998, वर्ल्ड चैंपियनशिप 1999 और 2004 जैसे बड़े मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने सैफ गेम्स और एफ्रो-एशियन गेम्स में भी कई मेडल जीते। 1999 के नेशनल गेम्स में उन्होंने 14 गोल्ड मेडल जीते। उसी साल काठमांडू में आयोजित दक्षिण एशियाई खेलों में उन्होंने 6 गोल्ड मेडल जीते।

ओलंपिक तक का सफर

निशा के करियर का सबसे बड़ा पड़ाव सिडनी 2000 ओलंपिक रहा। यहां उन्होंने 200 मीटर फ्रीस्टाइल में हिस्सा लिया और अपनी हीट जीती। उन्होंने ओलंपिक के लिए बी क्वालिफिकेशन टाइम हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला तैराकी बनाई।

रिकॉर्ड और उपलब्धियां

उन्होंने 200 मीटर और 400 मीटर फ्रीस्टाइल में 15 साल तक राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम रखा। साथ ही, उन्होंने 100 मीटर फ्रीस्टाइल में एक मिनट का बैरियर तोड़ने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। यह उपलब्धि भारतीय तैराकी में एक बड़ा मील का पत्थर मानी जाती है।

संघर्ष और संन्यास

2002 में पीठ की सर्जरी के बाद उनका करियर प्रभावित हुआ। 2004 ओलंपिक के लिए क्वालिफिकेशन करने से मामूली अंतर से चूकने और आर्थिक दिक्कतों के कारण उन्होंने तैराकी से संन्यास ले लिया। हालांकि, खेल से उनकी गतिविधि कभी खत्म नहीं हुई।

आज भी दे रही नई पीढ़ी को दिशा

संन्यास के बाद निशा मिलेट अपनी स्विमिंग अकादमी के जरिए नई पीढ़ी के तैराकीकों को ट्रेनिंग दे रही हैं। उनका लक्ष्य सिर्फ खिलाड़ी तैयार करना नहीं, बल्कि बच्चों में आत्मविश्वास और अनुशासन विकसित करना है।

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