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इच्छा मृत्यु का वरदान फिर भी 58 दिन बाणों पर क्यों लेटे रहे भीष्म पितामह जानिए असली रहस्य


नई दिल्ली । महाभारत के विशाल और गूढ़ इतिहास में भीष्म पितामह का व्यक्तित्व त्याग संकल्प और धर्म का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। देवव्रत से भीष्म बने इस महान योद्धा को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था यानी वे जब चाहें तब अपने प्राण त्याग सकते थे। लेकिन कुरुक्षेत्र युद्ध के दसवें दिन जब वे बाणों की शय्या पर गिरे तब उन्होंने तुरंत मृत्यु को स्वीकार नहीं किया बल्कि 58 दिनों तक असहनीय पीड़ा सहते हुए जीवित रहने का निर्णय लिया। यही निर्णय उन्हें साधारण योद्धा से महान आत्मा के रूप में स्थापित करता है।

कुरुक्षेत्र युद्ध के दसवें दिन का दृश्य अत्यंत मार्मिक था। अर्जुन ने शिखंडी को आगे कर भीष्म पर बाणों की वर्षा की क्योंकि भीष्म अपने वचन के कारण शिखंडी के विरुद्ध शस्त्र नहीं उठा सकते थे। परिणामस्वरूप उनका शरीर सैकड़ों बाणों से विदीर्ण होकर धरती पर नहीं गिरा बल्कि उन्हीं बाणों पर टिक गया। यह दृश्य केवल युद्ध का नहीं बल्कि त्याग और संकल्प की पराकाष्ठा का प्रतीक बन गया।

सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि जब उनके पास मृत्यु को चुनने की स्वतंत्रता थी तो उन्होंने इस पीड़ा को क्यों स्वीकार किया। इसका उत्तर उनके जीवन के मूल सिद्धांत में छिपा है जो था धर्म को सर्वोपरि रखना। भीष्म ने अपने वरदान का उपयोग केवल व्यक्तिगत मुक्ति के लिए नहीं किया बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान देने के अवसर के रूप में किया।

उन्होंने मृत्यु को इसलिए टाला ताकि वे धर्म और नीति का उपदेश दे सकें। बाणों की शय्या पर लेटे हुए उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म न्याय सत्य और जीवन के गूढ़ सिद्धांतों का ज्ञान दिया। यही उपदेश आगे चलकर महाभारत के शांति पर्व और भीष्म पर्व का आधार बने जो आज भी जीवन मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं।

इसके अलावा भीष्म ने शुभ समय की प्रतीक्षा भी की। हिंदू मान्यताओं के अनुसार उत्तरायण में प्राण त्यागना अत्यंत शुभ और मोक्षदायक माना जाता है। इसलिए उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने तक अपने शरीर को त्यागने का निर्णय स्थगित रखा। यह उनकी गहरी आध्यात्मिक समझ और आस्था को दर्शाता है।

उनका यह निर्णय केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि मानसिक शक्ति का भी अद्भुत उदाहरण था। असहनीय दर्द के बावजूद उन्होंने अपने मन और आत्मा को अडिग बनाए रखा। यह दिखाता है कि मनुष्य की इच्छाशक्ति शरीर की सीमाओं से कहीं अधिक शक्तिशाली हो सकती है।

बाणों की शय्या केवल पीड़ा का प्रतीक नहीं थी बल्कि जीवन के सत्य का दर्पण भी थी। यह सिखाती है कि कर्मों का फल हर व्यक्ति को भोगना पड़ता है लेकिन उसे स्वीकार कर उससे सीख लेना ही सच्चा धर्म है अंततः भीष्म पितामह का यह निर्णय हार नहीं बल्कि उनकी महानता का प्रतीक था। उन्होंने अपने कष्ट को ज्ञान में बदलकर मानवता को यह संदेश दिया कि सच्ची शक्ति कठिन परिस्थितियों में धैर्य कर्तव्य और धर्म का पालन करने में ही निहित है।

 महाभारत के विशाल और गूढ़ इतिहास में भीष्म पितामह का व्यक्तित्व त्याग संकल्प और धर्म का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। देवव्रत से भीष्म बने इस महान योद्धा को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था यानी वे जब चाहें तब अपने प्राण त्याग सकते थे। लेकिन कुरुक्षेत्र युद्ध के दसवें दिन जब वे बाणों की शय्या पर गिरे तब उन्होंने तुरंत मृत्यु को स्वीकार नहीं किया बल्कि 58 दिनों तक असहनीय पीड़ा सहते हुए जीवित रहने का निर्णय लिया। यही निर्णय उन्हें साधारण योद्धा से महान आत्मा के रूप में स्थापित करता है।

कुरुक्षेत्र युद्ध के दसवें दिन का दृश्य अत्यंत मार्मिक था। अर्जुन ने शिखंडी को आगे कर भीष्म पर बाणों की वर्षा की क्योंकि भीष्म अपने वचन के कारण शिखंडी के विरुद्ध शस्त्र नहीं उठा सकते थे। परिणामस्वरूप उनका शरीर सैकड़ों बाणों से विदीर्ण होकर धरती पर नहीं गिरा बल्कि उन्हीं बाणों पर टिक गया। यह दृश्य केवल युद्ध का नहीं बल्कि त्याग और संकल्प की पराकाष्ठा का प्रतीक बन गया।

सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि जब उनके पास मृत्यु को चुनने की स्वतंत्रता थी तो उन्होंने इस पीड़ा को क्यों स्वीकार किया। इसका उत्तर उनके जीवन के मूल सिद्धांत में छिपा है जो था धर्म को सर्वोपरि रखना। भीष्म ने अपने वरदान का उपयोग केवल व्यक्तिगत मुक्ति के लिए नहीं किया बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान देने के अवसर के रूप में किया।

उन्होंने मृत्यु को इसलिए टाला ताकि वे धर्म और नीति का उपदेश दे सकें। बाणों की शय्या पर लेटे हुए उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म न्याय सत्य और जीवन के गूढ़ सिद्धांतों का ज्ञान दिया। यही उपदेश आगे चलकर महाभारत के शांति पर्व और भीष्म पर्व का आधार बने जो आज भी जीवन मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं।

इसके अलावा भीष्म ने शुभ समय की प्रतीक्षा भी की। हिंदू मान्यताओं के अनुसार उत्तरायण में प्राण त्यागना अत्यंत शुभ और मोक्षदायक माना जाता है। इसलिए उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने तक अपने शरीर को त्यागने का निर्णय स्थगित रखा। यह उनकी गहरी आध्यात्मिक समझ और आस्था को दर्शाता है।

उनका यह निर्णय केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि मानसिक शक्ति का भी अद्भुत उदाहरण था। असहनीय दर्द के बावजूद उन्होंने अपने मन और आत्मा को अडिग बनाए रखा। यह दिखाता है कि मनुष्य की इच्छाशक्ति शरीर की सीमाओं से कहीं अधिक शक्तिशाली हो सकती है।

बाणों की शय्या केवल पीड़ा का प्रतीक नहीं थी बल्कि जीवन के सत्य का दर्पण भी थी। यह सिखाती है कि कर्मों का फल हर व्यक्ति को भोगना पड़ता है लेकिन उसे स्वीकार कर उससे सीख लेना ही सच्चा धर्म है।

अंततः भीष्म पितामह का यह निर्णय हार नहीं बल्कि उनकी महानता का प्रतीक था। उन्होंने अपने कष्ट को ज्ञान में बदलकर मानवता को यह संदेश दिया कि सच्ची शक्ति कठिन परिस्थितियों में धैर्य कर्तव्य और धर्म का पालन करने में ही निहित है।

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