स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर रामायण काल से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि जब भगवान हनुमान संजीवनी बूटी लेकर लौट रहे थे तब उन्होंने इस स्थान पर विश्राम किया था। इसी कारण यहां हनुमान जी की प्रतिमा विश्राम मुद्रा में स्थापित है जो अन्य मंदिरों से इसे अलग बनाती है। मंदिर नागपुर-छिंदवाड़ा मार्ग पर जाम और सर्पा नदियों के समीप स्थित है। प्राकृतिक वातावरण और धार्मिक आस्था का यह संगम इसे और भी खास बना देता है। यहां पीपल के पेड़ के नीचे स्थापित हनुमान जी की विशाल प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है।
सबसे रहस्यमयी पहलू यह है कि प्रतिमा की नाभि से निकलने वाली जलधारा का स्रोत आज तक ज्ञात नहीं हो सका है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है लेकिन भक्त इसे हनुमान जी की कृपा मानते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस जल को पीने या घर ले जाने से रोगों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार जिन लोगों पर नकारात्मक ऊर्जा या ग्रह दोष का प्रभाव होता है उन्हें यहां आकर पूजा करने की सलाह दी जाती है। विशेष रूप से शनि और मंगल दोष से पीड़ित लोग यहां आकर हनुमान जी की आराधना करते हैं और राहत की कामना करते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार मंदिर में दर्शन के बाद भक्तों को कुछ नियमों का पालन करना होता है जैसे सवा महीने तक तामसिक भोजन और बुरे आचरण से दूर रहना। इसे आस्था और अनुशासन का हिस्सा माना जाता है।
मंदिर से जुड़ी एक किंवदंती भी प्रचलित है जिसमें कहा जाता है कि पहले हनुमान जी की प्रतिमा खड़ी अवस्था में थी लेकिन जब डाकुओं ने यहां छिपे खजाने को चुराने की कोशिश की तो प्रतिमा ने स्वयं वर्तमान स्वरूप धारण कर उसकी रक्षा की। हालांकि इस कथा के प्रमाण नहीं हैं लेकिन यह लोगों की आस्था को और मजबूत करती है। इस प्रकार जामसांवली हनुमान मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है बल्कि आस्था रहस्य और विश्वास का अद्भुत संगम भी है जहां हर साल हजारों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं।