भोपाल। मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में स्थित तारामंडल में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम’ का रविवार देर शाम आयोजित पैनल चर्चा ‘वे फॉरवर्ड’ सत्र के साथ समापन हुआ। इस सत्र में देश के प्रमुख वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों ने अंतरिक्ष अनुसंधान, खगोल विज्ञान, स्वदेशी तकनीक, स्टार्टअप्स और भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका पर अपने विचार रखे।
मानव संसाधन और स्टार्टअप की भूमिका रही महत्वपूर्ण
पीआरएल, डीओएस अहमदाबाद के निदेशक प्रो. अनिल भारद्वाज ने सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों की सफलता के लिए कुशल मानव संसाधन सबसे महत्वपूर्ण आधार है। चंद्रमा पर मानव मिशन जैसे लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भौतिकी, रसायन विज्ञान, गणित, जीव विज्ञान, चिकित्सा और इंजीनियरिंग जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की आवश्यकता होगी। उन्होंने अंतरिक्ष चिकित्सा, जैव विज्ञान और खाद्य प्रौद्योगिकी जैसे उभरते क्षेत्रों के महत्व को भी रेखांकित किया। उन्होंने शिक्षा संस्थानों और अनुसंधान संगठनों के बीच बेहतर समन्वय और सूचना के आदान-प्रदान को आवश्यक बताते हुए कहा कि देश में विकसित हो रहे स्टार्टअप अंतरिक्ष क्षेत्र की जटिल चुनौतियों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
स्वदेशी तकनीक और उद्योग सहभागिता पर जोर
एनसीआरए-टीआईएफआर, एसपीपी परिसर पुणे के निदेशक प्रो. यशवंत गुप्ता ने खगोल विज्ञान की बड़ी परियोजनाओं में तकनीकी आत्मनिर्भरता और उद्योगों की भागीदारी को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि पहले कई तकनीकों के लिए भारत को विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन जीएमआरटी जैसे प्रोजेक्ट्स ने देश की तकनीकी क्षमता को साबित किया है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक परियोजनाओं में विकसित तकनीकों का साझा उपयोग किया जा सकता है, जिससे लागत कम होगी और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच मजबूत तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने की आवश्यकता बताई।
स्पेस साइंस की शिक्षा का विस्तार आवश्यक
आईआईएसटी के कुलपति प्रो. दीपांकर बनर्जी ने बतायाकि पिछले कुछ वर्षों में स्पेस साइंस क्षेत्र में 300 से अधिक स्टार्टअप सामने आए हैं, जो इस क्षेत्र की बढ़ती संभावनाओं को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोफिजिक्स की शिक्षा सीमित संस्थानों तक ही केंद्रित है, इसलिए इस ज्ञान को व्यापक स्तर पर पहुंचाने की आवश्यकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि स्पेस साइंस और एस्ट्रोनॉमी जैसे विषयों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थी प्रारंभ से ही इस क्षेत्र के प्रति प्रेरित हो सकें। प्रो. बनर्जी शिक्षा, उद्योग, तकनीक और अनुसंधान संस्थानों के संयुक्त प्रयासों को भविष्य के लिए आवश्यक बताया।
भारतीय ज्ञान परंपरा और इतिहास के पुनर्पाठ पर बल
इंडोलॉजिस्ट एवं चिंतक, पद्मश्री डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित ने भारतीय इतिहास और ज्ञान परंपरा के प्रमाण आधारित अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने उज्जैन और मालवा क्षेत्र की कालगणना एवं खगोल विज्ञान की समृद्ध परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इतिहास को तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर पुनः समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि उज्जैन प्राचीन काल से समय गणना और खगोल अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है और इस विरासत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है।
युवाओं के लिए अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अपार अवसर
पैनल विशेषज्ञों ने कहा कि भारत का अंतरिक्ष और खगोल विज्ञान क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा है और इसमें युवाओं के लिए रोजगार और अनुसंधान की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। यदि शिक्षा, अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच समन्वित प्रयास किए जाएं, तो भारत इस क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ सकता है। सम्मेलन ने उज्जैन की प्राचीन कालगणना परंपरा को आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान से जोड़ते हुए विज्ञान, इतिहास और भारतीय ज्ञान प्रणाली के समन्वय का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया।