डॉ. शैलेश शुक्ला
भारत आज दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है।
2024 में भारत की जनसंख्या लगभग 145 करोड़ को पार कर गई है। यह एक ऐसी समस्या है जो देश के
विकास, संसाधनों, पर्यावरण
और लोगों के जीवन स्तर पर सीधा असर डालती है। एक तरफ जहाँ देश तरक्की की राह पर
आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ बढ़ती आबादी उस तरक्की को खा जा रही
है। सड़कों पर भीड़, अस्पतालों में लंबी कतारें, स्कूलों में जगह की कमी और बेरोजगारी — ये सब बढ़ती
जनसंख्या के प्रत्यक्ष परिणाम हैं। इस लेख में हम बढ़ती जनसंख्या से होने वाले
नुकसानों को समझेंगे और उन पारंपरिक विचारधाराओं का खंडन करेंगे जो अधिक संतान
पैदा करने को प्रेरित करती हैं।
भारतीय समाचार विश्लेषण
बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणाम :
गरीबी और भुखमरी :
लेख लेखन कार्यशाला
जब किसी परिवार में कमाने वाला एक होता है और खाने वाले दस, तो गरीबी अपने आप आ जाती है। यही बात पूरे देश पर लागू होती
है। भारत में उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन
उससे कहीं ज्यादा तेजी से आबादी बढ़ रही है। नतीजा यह होता है कि प्रति व्यक्ति आय
कम रह जाती है। करोड़ों लोग आज भी दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे हैं। गरीबी का
सीधा संबंध अधिक जनसंख्या से है।
बेरोजगारी :
हर साल लाखों युवा पढ़-लिखकर नौकरी ढूँढने निकलते हैं, लेकिन नौकरियाँ उतनी तेजी से नहीं बढ़तीं जितनी तेजी से लोग
बढ़ रहे हैं। एक सरकारी पद के लिए लाखों आवेदन आते हैं। इससे निराशा, अपराध और सामाजिक अस्थिरता बढ़ती है। अगर जनसंख्या
नियंत्रित होती तो हर हाथ को काम मिलना आसान होता।
शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ :
सरकारी स्कूलों में एक कक्षा में 60-70 बच्चे बैठते हैं, जहाँ
शिक्षक का ध्यान हर बच्चे पर देना असंभव हो जाता है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों
की इतनी भीड़ होती है कि डॉक्टर को एक मरीज को देखने के लिए मुश्किल से दो मिनट
मिलते हैं। बढ़ती आबादी के कारण सरकार चाहकर भी हर व्यक्ति तक अच्छी शिक्षा और
स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुँचा पाती।
पर्यावरण का विनाश :
ज्यादा लोग यानी ज्यादा जमीन की जरूरत, ज्यादा पानी की खपत, ज्यादा
प्रदूषण और ज्यादा कचरा। जंगल काटकर बस्तियाँ बसाई जा रही हैं, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, भूजल
का स्तर गिर रहा है। जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा कारण अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि
है। अगर यही रफ्तार जारी रही तो आने वाली पीढ़ियों को साफ पानी और स्वच्छ हवा भी
नसीब नहीं होगी।
आवास और शहरीकरण की समस्या :
शहरों में जगह कम पड़ रही है। मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बढ़ती जा
रही है। लोग तंग और अस्वच्छ जगहों पर रहने को मजबूर हैं। ट्रैफिक जाम, पानी की कमी और बिजली की समस्या — ये सब अधिक जनसंख्या का
ही नतीजा है।
अपराध और सामाजिक अशांति :
जब लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं तो अपराध
बढ़ता है। भूख, बेरोजगारी और निराशा लोगों को गलत रास्ते पर धकेलती
है। अधिक जनसंख्या वाले इलाकों में चोरी, लूट
और हिंसा की घटनाएँ ज्यादा देखी जाती हैं।
पारंपरिक भ्रांतियाँ और उनका खंडन :
हमारे समाज में कई ऐसी पुरानी मान्यताएँ प्रचलित हैं जो
लोगों को अधिक संतान पैदा करने के लिए प्रेरित करती हैं। इन मान्यताओं की जड़ें
धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं में हैं। आइए इन
भ्रांतियों को एक-एक करके समझें और उनका तर्कपूर्ण खंडन करें।
भ्रांति 1 : संतान
से मोक्ष मिलता है : यह सबसे प्रचलित मान्यता है कि पुत्र के बिना मोक्ष नहीं
मिलता। कहा जाता है कि पुत्र पिंडदान करेगा तो पूर्वज मुक्त होंगे। इस मान्यता के
कारण लोग बेटे की चाह में कई संतानें पैदा करते रहते हैं।
खंडन : अगर हम धर्मग्रंथों को गहराई से पढ़ें तो मोक्ष कर्म, ज्ञान और भक्ति से मिलता है, संतान
की संख्या से नहीं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मोक्ष का मार्ग निष्काम
कर्म और आत्मज्ञान है। कोई भी धर्मग्रंथ यह नहीं कहता कि जिसके ज्यादा बच्चे होंगे, उसे ज्यादा पुण्य मिलेगा। मोक्ष व्यक्ति के अपने आचरण, सदाचार और आध्यात्मिक साधना पर निर्भर करता है। अगर संतान
से ही मोक्ष मिलता तो संन्यासियों, साधुओं
और ऋषि-मुनियों को मोक्ष कैसे प्राप्त होता? शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी
विवेकानंद — इन सबने संतान नहीं उत्पन्न की, फिर
भी ये महापुरुष माने गए।
भ्रांति 2 : बेटा
जरूरी है, बेटी से काम नहीं चलता : समाज में यह धारणा गहरी
जड़ें जमाए बैठी है कि बेटा वंश आगे बढ़ाता है, बुढ़ापे
का सहारा बनता है और अंतिम संस्कार करता है। इसलिए लोग बेटे की चाह में बच्चे पैदा
करते रहते हैं।
खंडन : आज के समय में बेटियाँ हर क्षेत्र में बेटों से आगे
निकल रही हैं। चाहे सेना हो, अंतरिक्ष
हो, खेल हो या प्रशासन — बेटियाँ हर जगह अपना परचम लहरा
रही हैं। कई बेटियाँ अपने माता-पिता की बुढ़ापे में बेटों से बेहतर देखभाल करती
हैं। रही बात अंतिम संस्कार की, तो आज
कानूनी रूप से बेटी को भी यह अधिकार प्राप्त है। जो लोग बेटे की चाह में पाँच-छह
बेटियाँ पैदा कर देते हैं, वे न उन बेटियों को अच्छी शिक्षा दे पाते हैं, न अच्छा जीवन। यह कोई समझदारी नहीं, बल्कि मूर्खता है।
भ्रांति 3 : ज्यादा
बच्चे यानी बुढ़ापे का सहारा : कई लोग सोचते हैं कि जितने ज्यादा बच्चे होंगे, बुढ़ापे में उतना ज्यादा सहारा मिलेगा। उनका मानना है कि
एक-दो बच्चे हुए तो कौन देखभाल करेगा।
खंडन : सच्चाई यह है कि आज के समय में ज्यादा बच्चे होने का
मतलब ज्यादा सहारा नहीं बल्कि ज्यादा खर्चा और ज्यादा चिंता है। अगर आप दो बच्चों
को अच्छी शिक्षा देते हैं, उन्हें संस्कारवान बनाते हैं तो वे दो बच्चे दस
बच्चों से बेहतर देखभाल करेंगे। दूसरी तरफ, अगर
पाँच-छह बच्चे हों और किसी को भी अच्छी शिक्षा या संस्कार न मिले, तो वे सब मिलकर भी बुढ़ापे में सहारा नहीं बन पाएँगे। आज
वृद्धाश्रमों में ऐसे बहुत से बुजुर्ग हैं जिनके चार-पाँच बच्चे हैं, लेकिन कोई उनकी सुध लेने वाला नहीं।