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पंचम दा का म्यूजिक मैजिक: कैसे साधारण कंघी ने ‘पड़ोसन’ के गाने को बनाया सुपरहिट


नई दिल्ली।भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया में अगर किसी संगीतकार को सबसे ज्यादा प्रयोगधर्मी और क्रिएटिव कहा जाता है तो वह हैं Rahul Dev Burman जिन्हें दुनिया प्यार से पंचम दा के नाम से जानती है। आरडी बर्मन को लोग यूं ही मैड जीनियस नहीं कहते थे। उनके संगीत में ऐसी अनोखी कल्पनाशीलता थी जिसे आज भी दोहराना आसान नहीं है। पंचम दा जब भी किसी गाने की रिकॉर्डिंग करते थे तो सिर्फ पारंपरिक वाद्ययंत्रों पर निर्भर नहीं रहते थे बल्कि रोजमर्रा की चीजों से भी ऐसी आवाजें निकाल लेते थे जो गाने में नई जान भर देती थीं।

उनकी इसी क्रिएटिव सोच का एक दिलचस्प उदाहरण 1968 में आई फिल्म Padosan के सुपरहिट गाने Mere Samne Wali Khidki Mein में देखने को मिलता है। यह गाना उस दौर में जितना लोकप्रिय था उतना ही आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। अक्सर लोग इस गाने को गुनगुनाते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस गाने में एक खास साउंड किसी म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट से नहीं बल्कि एक साधारण कंघी से निकाला गया था।

दरअसल फिल्म में Sunil Dutt एक शरारती पड़ोसी की भूमिका निभाते हैं जो सामने वाली खिड़की में रहने वाली लड़की को अपने अंदाज में रिझाने की कोशिश करता है। गाने का माहौल भी हल्का फुल्का और शरारत से भरा हुआ है। जब इस गाने की रिकॉर्डिंग की तैयारी चल रही थी तब पंचम दा को लग रहा था कि गाने में कुछ ऐसा होना चाहिए जो उसकी मस्ती और शरारत को और ज्यादा उभार सके। स्टूडियो में उस समय बड़े बड़े संगीतकार मौजूद थे। वायलिन, गिटार और कई अन्य वाद्ययंत्र तैयार थे लेकिन पंचम दा को कुछ अलग चाहिए था।

बताया जाता है कि काफी देर सोचने के बाद अचानक पंचम दा ने अपनी जेब में हाथ डाला और एक साधारण प्लास्टिक की कंघी निकाल ली। इसके बाद उन्होंने उस कंघी को एक खुरदुरी सतह पर रगड़ना शुरू किया। जैसे ही उससे कर्र कर्र जैसी आवाज निकली पंचम दा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्हें लगा कि यही वह साउंड है जो गाने के शरारती मूड को और दिलचस्प बना सकता है।

स्टूडियो में मौजूद लोग पहले तो यह देखकर हैरान रह गए कि एक मशहूर संगीतकार रिकॉर्डिंग के दौरान कंघी से आवाज निकालने की कोशिश कर रहा है। खासतौर पर गायक Kishore Kumar को यह दृश्य काफी मजेदार लगा। उन्होंने पंचम दा को देखकर मजाक किया और सिर पकड़ लिया। लेकिन जब रिकॉर्डिंग पूरी हुई और गाना तैयार हुआ तो हर कोई उनकी प्रतिभा का कायल हो गया।

गाने की शुरुआत और बैकग्राउंड में जो हल्की क्रिक क्रिक जैसी आवाज सुनाई देती है वह असल में उसी कंघी से पैदा की गई थी। यह छोटी सी ध्वनि गाने में एक अलग तरह की मस्ती और चुलबुलापन जोड़ देती है। यही वजह है कि आज भी यह गाना सुनते समय श्रोताओं को अलग आनंद मिलता है भले ही वे उस साउंड के पीछे की कहानी से अनजान हों।

आरडी बर्मन की खासियत यही थी कि वे संगीत को सिर्फ सुर और ताल तक सीमित नहीं रखते थे बल्कि रोजमर्रा की चीजों को भी संगीत का हिस्सा बना देते थे। कभी पानी की छपाक, कभी कांच की बोतल की टनकार और कभी चम्मच और ग्लास की आवाजें उनके गानों में सुनाई देती थीं। उनकी यही प्रयोगधर्मिता उन्हें बाकी संगीतकारों से अलग बनाती है।

आज जब लोग इस गाने को ध्यान से सुनते हैं और कंघी से निकली उस आवाज़ को पहचानने की कोशिश करते हैं तो उन्हें एहसास होता है कि पंचम दा की क्रिएटिविटी कितनी अनोखी थी। यही कारण है कि दशकों बाद भी आरडी बर्मन का संगीत उतना ही ताजा और दिलचस्प लगता है जितना अपने दौर में था।

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