राज्यपाल ने स्पष्ट किया कि पुनर्वास का उद्देश्य बंदियों को अपराध की पहचान से मुक्त कर बेहतर नागरिक के रूप में स्थापित करना है। उन्होंने कहा कि मामूली अपराधों में विचाराधीन कैदियों को केवल सजा देना पर्याप्त नहीं बल्कि उन्हें रचनात्मक गतिविधियों और नैतिक मार्गदर्शन के माध्यम से समाज की मुख्यधारा में लौटने योग्य बनाना आवश्यक है। इस दिशा में उत्पादक गतिविधियों का संयोजन कर बंदियों को रोजगारपरक कार्यों से जोड़ने की आवश्यकता बताई गई ताकि वे अपने परिवारों के जीवन-निर्वाह में भी आर्थिक सहयोग दे सकें।
बैठक में राज्यपाल ने प्रधानमंत्री के लोकप्रिय कार्यक्रम मन की बात का उल्लेख करते हुए सुझाव दिया कि इसका नियमित प्रसारण जेलों में कराया जाए। उनका मानना है कि इस कार्यक्रम के माध्यम से बंदियों को देश की प्रगति प्रेरक व्यक्तित्वों और सकारात्मक पहल से जुड़ने का अवसर मिलेगा जिससे उनके भीतर आशावाद आत्मबल और आत्म-सुधार की भावना विकसित होगी। जेल की दीवारों के पीछे एकाकी जीवन जी रहे बंदियों के लिए यह कार्यक्रम मानसिक और नैतिक संबल का कार्य कर सकता है।
राज्यपाल ने महिला बंदियों और उनके बच्चों के समुचित लालन-पालन बुजुर्ग एवं दिव्यांग बंदियों के लिए आवश्यक कृत्रिम उपकरणों की उपलब्धता तथा लंबित दया याचिकाओं के त्वरित निराकरण जैसे मुद्दों पर भी विशेष चर्चा की। उन्होंने कहा कि संवेदनशील वर्गों के लिए विशेष व्यवस्था सुनिश्चित करना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है।
बैठक में उपस्थित अपर मुख्य सचिव गृह श्री शिव शेखर शुक्ला ने जानकारी दी कि वर्ष 2025-26 में प्राप्त 18 दया याचिकाओं का विभिन्न स्तरों पर परीक्षण किया जा रहा है और पिछले पांच वर्षों में आई सभी याचिकाओं की समीक्षा की प्रक्रिया भी जारी है। त्वरित निपटान के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर तैयार किया जा रहा है जिससे प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध हो सके। उन्होंने यह भी बताया कि जेल विभाग द्वारा एक अभिनव पहल के तहत गीता पाठ के ऑनलाइन कार्यक्रम का प्रदेश की जेलों में साप्ताहिक प्रसारण किया जा रहा है जिसमें श्लोकों का शुद्ध उच्चारण और भावार्थ समझाया जाता है। यह पहल बंदियों में नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना के विकास में सहायक सिद्ध हो रही है।