नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते ईरान-इजरायल तनाव का असर अब भारतीय शेयर बाजार पर साफ नजर आ रहा है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता के चलते बाजार में लगातार गिरावट का माहौल बना हुआ है। पिछले कुछ हफ्तों में निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है और बाजार में डर और अस्थिरता बढ़ गई है।
27 फरवरी से 19 मार्च के बीच सेंसेक्स करीब 7,080 अंक गिरकर 81,287 से 74,207 के स्तर पर आ गया। वहीं निफ्टी में भी लगभग 2,176 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। इस दौरान निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ा और बाजार में घबराहट देखने को मिली।
₹37 लाख करोड़ का नुकसान
मिडिल ईस्ट संकट शुरू होने के बाद से निवेशकों की संपत्ति में भारी गिरावट आई है। कुल मिलाकर करीब ₹37 लाख करोड़ का नुकसान हुआ है। सिर्फ एक दिन, गुरुवार को ही लगभग ₹12.87 लाख करोड़ का नुकसान दर्ज किया गया, जो हाल के वर्षों की सबसे बड़ी गिरावटों में से एक माना जा रहा है।
महंगा कच्चा तेल बना मुख्य कारण
कच्चे तेल की कीमतें 110 से 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका गहरा गई है। कंपनियों की लागत बढ़ने से उनके मुनाफे पर दबाव पड़ रहा है, जिसका सीधा असर शेयर बाजार पर दिख रहा है।
वैश्विक बाजार भी दबाव में
इस संकट का असर केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका, यूरोप और एशिया के शेयर बाजारों में भी गिरावट देखी जा रही है। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भारतीय बाजार की कमजोरी को और बढ़ा दिया है।
केंद्रीय बैंकों का सख्त रुख
अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरें 3.5%–3.75% पर स्थिर रखी हैं और संकेत दिया है कि महंगाई कम होने तक राहत की उम्मीद नहीं है। बैंक ऑफ इंग्लैंड और यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने भी दरों में कोई बदलाव नहीं किया, जिससे बाजार में लिक्विडिटी को लेकर चिंता बनी हुई है।
20 दिनों में करीब 9% की गिरावट
पिछले 20 दिनों में सेंसेक्स करीब 8.71% और निफ्टी लगभग 8.65% तक गिर चुके हैं। ब्रोकरेज फर्म नोमूरा के अनुसार, अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो वित्त वर्ष 2027 में कंपनियों की कमाई 10–15% तक घट सकती है।
कमजोर शुरुआत का रिकॉर्ड
साल 2026 की शुरुआत भी शेयर बाजार के लिए निराशाजनक रही है। 1 जनवरी से 16 मार्च के बीच सेंसेक्स 11.4% तक गिर चुका है। पिछले 47 वर्षों में यह पांचवीं सबसे खराब शुरुआत मानी जा रही है। इससे पहले 2020 कोरोना संकट और 2008 वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान इससे बड़ी गिरावट देखी गई थी। युद्ध जैसे हालात, महंगा कच्चा तेल और सख्त मौद्रिक नीतियों के चलते बाजार पर दबाव बना हुआ है। ऐसे में निवेशकों को सतर्क रहने और लंबी अवधि की रणनीति अपनाने की सलाह दी जा रही है।