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दबाव के आगे नहीं झुका श्रीलंका अमेरिका को लैंडिंग से इनकार ईरानी जहाज को दी मानवीय मदद

नई दिल्ली:ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच श्रीलंका ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसने हिंद महासागर क्षेत्र की कूटनीति को नया मोड़ दे दिया है। श्रीलंका ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी सैन्य टकराव का हिस्सा नहीं बनेगा और अपनी तटस्थ नीति पर कायम रहेगा। इसी नीति के तहत उसने अमेरिका के दो लड़ाकू विमानों को अपने यहां उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने संसद में खुलकर बताया कि अमेरिका ने 4 और 8 मार्च को दो बार अनुरोध किया था कि जिबूती स्थित अपने सैन्य अड्डे से उड़ान भरने वाले फाइटर जेट्स को दक्षिणपूर्व स्थित मट्टाला अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर उतरने दिया जाए। इन विमानों में एंटी शिप मिसाइलें लगी हुई थीं जिससे स्थिति और संवेदनशील हो गई थी। राष्ट्रपति ने कहा कि भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद श्रीलंका ने इस मांग को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि वह किसी भी सैन्य कार्रवाई का मंच नहीं बनेगा।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। 4 मार्च को अमेरिका की एक पनडुब्बी ने अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में ईरानी युद्धपोत IRIS Dena पर टॉरपीडो हमला किया था। यह हमला श्रीलंका के दक्षिणी तट से करीब 80 किलोमीटर दूर हुआ जिसमें बड़ी संख्या में ईरानी नौसैनिक मारे गए। इस घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया।

हमले के तुरंत बाद श्रीलंका ने मानवीय जिम्मेदारी निभाते हुए तेजी से रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। श्रीलंकाई नौसेना और वायुसेना ने मौके पर पहुंचकर शवों को बरामद किया और घायलों को बचाया। उन्हें गाले में इलाज के लिए ले जाया गया। बाद में मृतकों के शव पूरे सम्मान के साथ ईरान भेजे गए।

इसी बीच एक अन्य ईरानी जहाज IRIS Bushehr ने तकनीकी खराबी का हवाला देते हुए श्रीलंका से मदद मांगी। श्रीलंका ने इसे भी पूरी तरह मानवीय आधार पर सहायता दी लेकिन सुरक्षा कारणों से उसे सीधे कोलंबो में प्रवेश नहीं दिया गया। पहले उसे समुद्र में रोका गया और बाद में त्रिंकोमाली की ओर निर्देशित किया गया। इस दौरान कई ईरानी नौसैनिकों को अस्थायी रूप से श्रीलंका में शरण भी दी गई।

राष्ट्रपति दिसानायके ने संसद में दो टूक कहा कि मध्य पूर्व में चल रहा युद्ध पूरी दुनिया के लिए चुनौती है लेकिन श्रीलंका किसी पक्ष में खड़ा होकर अपने हितों को खतरे में नहीं डालेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका देश स्वतंत्र विदेश नीति पर चलता रहेगा और किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेगा।

यह घटनाक्रम हिंद महासागर क्षेत्र में बदलते शक्ति संतुलन को दर्शाता है जहां छोटे देश भी अब अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूती से स्थापित कर रहे हैं। श्रीलंका का यह कदम न सिर्फ उसकी तटस्थता का संकेत है बल्कि यह भी दिखाता है कि वह मानवीय मूल्यों और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

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